सुप्रीम कोर्ट ने कहा, प्रोजेक्‍ट अधूरा रखते हैं, तब बिल्‍डर अपनी जिम्मेदारी से पल्‍ला नहीं झाड़ सकते – Daily Kiran
Thursday , 9 December 2021

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, प्रोजेक्‍ट अधूरा रखते हैं, तब बिल्‍डर अपनी जिम्मेदारी से पल्‍ला नहीं झाड़ सकते

नई दिल्‍ली . बिल्‍डर और रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की लंबी कानूनी लड़ाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने बड़ा फैसला दिया है.फैसला आरडब्‍लूए के पक्ष में सुनाया गया है. शीर्ष न्‍यायालय ने साफ किया है कि बिल्‍डर अगर वादे के मुताबिक सभी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और दूसरी सुविधाओं को पूरा किए बगैर प्रोजेक्‍ट अधूरा रखते हैं,तब वे मेनटिनेंस और एडमिनिस्‍ट्रेशन का जिम्‍मा हाउसिंग सोसाइटी को सौंपकर इससे पल्‍ला नहीं झाड़ सकते हैं. करीब 18 साल पुराने एक मामले में फैसला देकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने यह बात कही है. इस मामले में बिल्डर ने नोएडा (Noida) में एक हाउसिंग प्रोजेक्‍ट को रेजिडेंट्स एसोसिएशन को सौंपकर किनारा कर लिया था. जस्टिस हेमंत गुप्‍ता और वी रामासुब्रमण्‍यम की पीठ ने पद्मिनी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर नाम की कंपनी को रॉयल गार्डन आरडब्‍लूए को 60 लाख रुपये भुगतान करने का निर्देश दिया है. कंपनी ने वादे के अनुसार वॉटर सॉफ्टनिंग प्‍लांट, दूसरा हेल्‍थ क्‍लब, स्‍वीमिंग पूल और फायर फाइटिंग सिस्‍टम नहीं बनवाया था.

देशभर में ऐसी सोसाइटीज को इस तरह की समस्‍या का सामना करना पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) का यह फैसला घर खरीदारों का मनोबल बढ़ाएगा. यह और बात है कि रेरा कानूनों में इनमें से कुछ पहलुओं को समेटा गया है. आरडब्‍लूए और बिल्‍डरों के बीच इस तरह के काफी विवाद अलग-अलग अदालतों और कंज्‍यूमर कोर्टों में लंबित हैं. रियल एस्‍टेट कंपनी ने 282 अपार्टमेंट का हाउसिंग प्रोजेक्‍ट बनवाया था. लोगों को पजेशन 1998-2001 में दिया गया था. खरीदारों ने आरडब्‍लूए का गठन किया था. इसका रजिस्‍ट्रेशन 2003 में कराया गया था. सोसाइटी रजिस्‍ट्रेशन ऐक्‍ट के तहत यह रजिस्‍ट्रेशन कराया गया था. बिल्‍डर के साथ आरडब्‍लूए ने एक एग्रीमेंट किया था. यह नवंबर 2003 में हुआ था. इसमें अपार्टमेंट कॉम्‍प्‍लेक्‍स के मेनटिनेंस की जिम्‍मेदारी बिल्‍डर ने ली थी. लेकिन बिल्‍डर ने वादा पूरा नहीं किया. इसके बाद आरडब्‍लूए ने नेशनल कंज्‍यूमर डिस्‍प्‍यूट्स रिड्रेसल कमीशन का दरवाजा खटखटाया. कमीशन ने साइट का दौरा और रिपोर्ट फाइल करने के लिए एक स्‍थानीय आयुक्‍त को नियुक्‍त किया. रिपोर्ट के आधार पर, एनसीडीआरसी ने एसोसिएशन की याचिका को अनुमति दी.

इसके बाद कंपनी शीर्ष न्‍यायालय पहुंच गई. 2010 में कोर्ट ने उपभोक्‍ता आयोग के फैसले पर अंतरिम आदेश देते हुए रोक लगा दी थी. हालांकि, कंपनी से अपनी रजिस्‍ट्री में 60 लाख रुपये डिपॉजिट करने को कहा था. एक दशक बाद याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने एसोसिएशन को यह रकम सौंपने का निर्देश दिया. इस तरह 18 साल पुराना यह मामला खत्‍म हुआ. कोर्ट ने कंपनी की याचिका को खारिज कर दिया. वहीं, स्‍थानीय आयुक्‍त की रिपोर्ट को स्‍वीकार कर लिया.

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