तारों में वैज्ञानिक चुनौती का समाधान उनके इतिहास को बेहतर ढंग से जानने में मदद कर सकता है – Daily Kiran
Saturday , 23 October 2021

तारों में वैज्ञानिक चुनौती का समाधान उनके इतिहास को बेहतर ढंग से जानने में मदद कर सकता है

नई दिल्ली (New Delhi) . रासायनिक गठन के माध्यम से सितारों के निर्माण और उत्पत्ति के इतिहास में खगोलविदों की जांच लंबे समय से एक पेचीदा ‘कार्बन समस्या’ से बाधित रही है – तत्वों की प्रचुरता के अनुमानित और प्राप्त किए गए आकलनों के बीच यह एक ऐसी विसंगति है जो आर कोरोना बोरेलिस (आरसीबी) नाम से ज्ञात निश्चित हाइड्रोजन की कमी वाले सितारों की सतह पर विभिन्न तत्वों की प्रचुरता वैज्ञानिकों को सही ढंग से गणना नहीं करने देती है. उन्होंने अब इस प्रचुरता का विश्लेषण करने के लिए एक नई विधि के साथ इसका समाधान ढूंढ लिया है और पुस्तकों में उपलब्ध मौजूदा मानकों में संशोधन किया है.

यह विधि खगोलविदों को आरसीबी सितारों में विभिन्न तत्वों की प्रचुरता की गणना करने और उनके गठन और विकास का बेहतर ढंग से पता लगाने में सहायता देगी. खगोलविद सितारों में विभिन्न तत्वों की प्रचुरता को निर्धारित करने के लिए उनकी वर्णक्रमीय रेखाओं (स्पेक्ट्रल लाइंस) का उपयोग करते हैं. विभिन्न प्रकार के तारों की सतह पर इन तत्वों की अत्यधिक प्रचुरता अलग-अलग हो सकती है. ऐसे ही एक वर्ग के तारे जिन्हें आर कोरोना बोरेलिस सितारे (आरसीबी) कहा जाता है, में अपेक्षाकृत भारी तत्व हीलियम (एचई) की प्रचुरता की तुलना में बहुत कम हाइड्रोजन होता है, उनमे से ऐसा ही एक तत्व कार्बन है. यह उन अधिकांश सितारों के विपरीत है जिनके वायुमंडल में हाइड्रोजन की अत्यधिक उपलब्धता है. ये महाविशाल (सुपरजाइंट) तारे हैं, जिनकी सतह का तापमान 5000के से 7000के है. हाइड्रोजन की न्यूनता वाले सितारों की सतह की प्रचुरता को उस हीलियम (एचई) के सापेक्ष मापा जाता है, जो उनके वायुमंडल में सबसे प्रचुर तत्व है.

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