
New Delhi, 5 जून . हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विरोधी Political माहौल को नए सिरे से परिभाषित किया है. जुलाई के आखिर में शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र के दौरान Political हालात पूरी तरह बदले हुए नजर आ सकते हैं.
2024 के Lok Sabha चुनाव से पहले ‘इंडिया’ नाम से विपक्ष का गठबंधन बना था. तब से इस गठबंधन में कई बार तनाव और बदलाव देखे गए हैं. इसकी शुरुआत गठबंधन के मुख्य सूत्रधारों में से एक, जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार के जल्द ही बाहर हो जाने से हुई थी.
2024 के Lok Sabha चुनाव और उसके बाद कई राज्यों में हुए चुनावों के दौरान, गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों को सीटों के बंटवारे पर आम सहमति बनाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा. वहीं, आम आदमी पार्टी (आप) का कहना था कि यह गठबंधन सिर्फ संसदीय चुनावों के लिए ही बनाया गया था.
अब, तमिलनाडु में कांग्रेस ने द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) के साथ अपना गठबंधन तोड़ लिया है. इसके बाद डीएमके ने New Delhi में अगले हफ्ते होने वाली इंडिया गठबंधन के नेताओं की बैठक में शामिल न होने का फैसला किया. साथ ही, संसद के आगामी सत्र के दौरान Lok Sabha में भी वह अपने पूर्व सहयोगी दल से अलग बैठने की तैयारी में है.
इस बीच, तृणमूल कांग्रेस, जो संसद में गठबंधन की समन्वय बैठकों से ज्यादातर दूर ही रही है, अब खुद अपनी चेयरपर्सन ममता बनर्जी के जरिए प्रतिनिधित्व करने जा रही है.
ऐसा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार और ममता बनर्जी का ध्यान राष्ट्रीय राजनीति की ओर लगाने के बाद हो रहा है.
इस घटनाक्रम से अटकलें तेज हो गई हैं कि यह कदम पार्टी के सांसदों को एकजुट रखने के मकसद से उठाया गया है, क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा में उनके गुट को ‘नेता प्रतिपक्ष’ का पद बागी नेताओं के हाथों गंवाना पड़ा था.
तमिलनाडु में चुनाव नतीजों ने चौंका दिया, जिसमें फिल्म स्टार विजय की पार्टी टीवीके ने विधानसभा की 234 में से 108 सीटें जीतीं.
इसके बाद कांग्रेस ने डीएमके के साथ अपना 11 साल पुराना गठबंधन तोड़ लिया और टीवीके के साथ गठबंधन कर लिया. इसके चलते डीएमके ने औपचारिक रूप से इंडिया गठबंधन से बाहर होने का फैसला किया. अगले महीने संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है और इसमें जरूरी विधायी कामकाज होने की उम्मीद है. सत्ताधारी एनडीए के पास अभी 18वीं Lok Sabha में 292 सीटें हैं, जिनमें से अकेले भाजपा के पास 240 सीटें हैं.
यह मजबूत बहुमत यह पक्का करता है कि सत्ता पक्ष आसानी से कानून पास करवा सकता है, जबकि विपक्षी इंडिया गठबंधन, जिसके पास पहले 234 सीटें थीं, अब बिखरता हुआ दिख रहा है.
डीएमके के पास अभी 22 सांसद हैं, जो Lok Sabha में विपक्षी पार्टियों में चौथी सबसे बड़ी संख्या है. 98 सीटों के साथ कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी बनी हुई है.
डीएमके के अलग होने के फैसले से विपक्ष की प्रभावी ताकत घटकर लगभग 212 सीटों पर आ गई है. अब यह देखना बाकी है कि आप के तीन सांसद क्या रुख अपनाते हैं.
विपक्ष का दूसरा बड़ा गुट Samajwadi Party है, जिसके पास 37 सीटें हैं.
पश्चिम बंगाल की स्थिति मामले को और जटिल बनाती है.
भाजपा की जबरदस्त जीत ने राज्य में तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन को खत्म कर दिया. भाजपा ने 294 विधानसभा सीटों में से 206 सीटें जीतीं.
अब, पार्टी के अंदर असंतोष ने अनिश्चितता पैदा कर दी है. तृणमूल के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने ‘सूत्रों’ का हवाला देते हुए दावा किया है कि कई सांसद पाला बदल सकते हैं.
77 वर्षीय सांसद उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक इंटर्न के रेप और हत्या पर खुलकर चिंता जताई थी और इस अपराध के बाद हुए विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया था.
Lok Sabha में तृणमूल के पास 28 सीटें हैं, इसलिए 19 सांसदों का एक समूह दलबदल विरोधी कानून के दायरे में आए बिना पाला बदल सकता है. राज्यसभा में पार्टी के पास रॉय सहित 13 सांसद हैं.
वहीं, Lok Sabha में भाजपा के 240 सदस्य हैं, और उसके बाद सहयोगी पार्टियां हैं जैसे तेलुगु देशम पार्टी (16 सीटें), जनता दल (यूनाइटेड) (12 सीटें), शिवसेना (7 सीटें) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (5 सीटें). राज्यसभा में कुल 245 सीटों में से भाजपा के 113 सदस्य हैं, जनता दल (यूनाइटेड) के 4 और शिवसेना के 2 सदस्य हैं.
विपक्ष की तरफ, ‘आप’ में हुई फूट का असर इंडिया गठबंधन पर भी पड़ सकता है, क्योंकि अब उसके पास सिर्फ तीन सदस्य बचे हैं. डीएमके के 8 राज्यसभा सांसदों के किसी भी गुट से अलग बैठने का फैसला करने से पार्टी की ताकत और कम हो जाएगी.
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एएसएच/डीकेपी