Saturday , 28 November 2020

देश में 80 फीसदी हिन्दू होने के बाद भी क्या कारण है कि भाजपा का मत प्रतिशत उसके आधे से भी कम है

(लेखक- एड. आराधना भार्गव / )
देश में 80 प्रतिशत हिन्दू होने के बाद भी भाजपा का मत प्रतिशत उसके आधे से कम है याने हर तीन लोगों में दो ने इसे अपना मत नही दिया है. देश का मतदाता हमेशा एक विकल्प की तलाश में रहता है. अखलाक, पहलू खान, जुनैद और तबरेज का मारा जाना भी ‘वसुधैवकुटुम्बकम’ की अवधारणा में जीने वाले सनातनी बहुसंख्यकों की चेतना को झकझोरता है. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में अखलाक और पहलू खान की जिस तरह हत्या (Murder) की गई और हत्या (Murder) रे अदालत से छूट गये, देश की जनता इसे पचा नही पाई. डाॅ. खान पर देशद्रोह का मामला दर्ज कर उन्हें जेल के सींखचों में डालना तो उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के उच्च न्यायालय को भी नही भाया. संविधान में 42वां संशोधन 1976 में किया गया जिसमें यह सुनिश्चित किया गया था कि भारतीय राज्य व्यवस्था का ध्येय समाजवाद है. उसके बाद ही संसाधनों का राष्ट्रीयकरण किया गया जिसमें हमने कोयले एवं बैंकों के राष्ट्रीयकरण के अच्छे परिणाम देखे.

किन्तु वर्तमान में केन्द्र में बैठी भाजपा की सरकार देश की सम्पत्ति जो देश की जनता ने अपनी मेहनत की कमाई से बनाई थी और वह सम्पत्ति जो देश के संचालन के लिए अधिक से अधिक राजस्व दे रही थी, जो घाटे में नही थी, उसे निजी हाथों में सौंपने का काम तेज गति से सौंप रही है. कोयले की खदाने निजी हाथों में जाने का मतलब प्रकृति को अधिक से अधिक दोहन तथा सम्पत्ति का लाभ व्यक्ति विशेष के पास जाना. कोयले की खदानों के अधिग्रहण करने पर किसानों को मुआवजे के साथ साथ केन्द्र सरकार की नौकरी मिलने की गैरंटी थी वह भी धीरे धीरे समाप्त हो गई. खदान के अन्दर काम करने वाले मजदूर को तीन से चार हजार रूपये का वेतन लेकर संतुष्ट होना पड़ रहा है. खदान के अन्दर मौत होने पर मुआवजा तो दूर उसकी लाश मिलना भी सम्भव नही है. शिक्षा व स्वास्थ्य निजी हाथों में सौपने के दुष्परिणाम हमने कोरोना काल में अच्छे तरीके से महसूस किये है. धरती पर जंगल का निर्माण जंगल में निवास करने वाले नागरिकों ने किया जिसे बिगड़े जंगल के नाम पर प्रथम चरण में निजी हाथों में सौंपने की कार्यवाही चल रही है.

किसान आन्दोलन का रास्ता तभी पकड़ते है जब पानी नाक के उपर चला जाता है. किसान कई सालों से परेशान है. नष्ट हुई फसल का मुआवजा मागने के लिए एकत्रित हुए तो 12 जनवरी 1998 को किसानों के सीने पर गोली दागने का आदेश देकर उनके सीनों को छलनी कर दिया गया. 24 किसान शहीद हुए, 250 किसानों पर फर्जी मुकदमे लादे गये, किसानों का नेतृत्व कर रहे साथियों को आजीवन कारावास की सजा से नवाजा गया. 2014 के चुनाव से पहले स्वामीनाथन कमीशन के फाॅर्मूले से फसल का ढेड़ गुना (guna) दाम देने का वादा किया था, लेकिन वर्तमान में किसानों की लागत भी नही निकल पा रही है. किसान विरोधी कानून बनाकर सरकार किसानों की जमीन पूँजीपति के हाथ में सौंपने की पूरी तैयारी में है.

वर्तमान में किसान के आंगन मक्के की फसल से भरे हुए पड़े है, किन्तु भाव ना मिलने के कारण किसान बिजली के अस्थाई कनेक्शन प्राप्त करने हेतु माँ, पत्नि तथा विवाह योग्य बेटी के जेवर सूदखोरों के पास रखने पर मबजूर है. ग्रामीण क्षेत्र में मदर इंडिया पिक्चर की तस्वीर देखने को मिल रही है. प्रदेश के नेता जन्मदिन मनाने में व्यस्त है. श्रम कानून में परिवर्तन करके मजदूरों को शौषण किया जा रहा है. लाखों मजदूरों ने कुर्बानी देकर 8 घण्टे काम का समय निर्धारित किया था जिसे हमारी चुनी हुई सरकारों ने समाप्त कर दिया. आईये हम सब मिलकर सरकार के किसान विरोधे चेहरे का पर्दाफास करें. संविधान दिवस 26 नवम्बर से संवैधानिक हक की लड़ाई शुरू करें. किसान साथियों से आग्रह है देश भर के 500 किसान संगठन दिल्ली में संयुक्त किसान मोर्चे के कार्यक्रम के लिए एकजुट हो गये है. जब तक देश में भूखा इंसान रहेगा धरती पर तूफान रहेगा, इस तूफान को रोकने के लिए 26 एवं 27 नवम्बर को दिल्ली चलों.