Friday , 27 November 2020

मेवाड़ में देवी-शक्तियों के प्राचीन व महत्वपूर्ण स्थल

उदयपुर (Udaipur). सम्पूर्ण राजस्थान (Rajasthan) में नवरात्रि में देवी पूजा की सुदीर्घ परम्परा रही है. नवरात्रियों में कन्याओं का देवी समान आदर-सत्कार कर पूजन की प्राचीन परम्परा रही है. मेवाड़ में सभी ओर देवी-शक्तियों के कई प्राचीन व महत्वपूर्ण स्थल है. मेवाड़ में एकलिंगजी ट्रस्ट से सम्बद्ध प्रमुख शक्तिस्थलों में बिराजमान माँ भगवती के विभिन्न स्वरुपों का संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय निम्नानुसार है:

कुलदेवी बाणमाताजी

बड़वा की ख्यात के अनुसार राणा लक्ष्मणसिंह के कार्यकाल के दौरान मेवाड़ राजपरिवार की कुलदेवी के रुप में प्रतिष्ठित बाणमाताजी का तेरहवीं शताब्दी में पुर-पाटण (गुजरात (Gujarat)) से मेवाड़ में पदार्पण हुआ. तभी से यहाँ उनकी विधिवत पूजा होती है. राज्य की कई जिम्मेदारियां होती है. उनमें से कुलदेवी की विधिवत सेवा-पूजा एवं रक्षा का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व मेवाड़ के भट्ट परिवार को सौंपा गया, जिसे निष्ठावान भट्ट परिवार ने कठोर परिश्रम एवं ईमानदारी के साथ अब तक निभाया है.
दोनों नवरात्र में स्थापना पर गाजे-बाजे के साथ बाणमाताजी का महलों में पधारना होता है. अष्टमी का हवन होने के पश्चात् उत्तर पूजनोपरान्त वापस माताजी का महलों से गाजे-बाजे के साथ भट्टजी के निवास पर पधारना होता है.

अम्बामाताजी ( एकलिंगजी परिसर)

कैलाशपुरी स्थित परमेश्वराजी महाराज एकलिंगजी मंदिर परिसर में मुख्य दक्षिण द्वार के बाहर कुछ ऊँचाई पर अवस्थित तीन मंदिरों में से एक श्वेत पाषाण निर्मित माँ अम्बिका की चतुर्भज प्रतिमा विराजमान है. माँ अम्बे का यह स्वरूप अत्यंत ही सौम्य एवं मनोहारी है.

अन्नपूर्णामाताजी (बड़ीपोल)

सिटी पेलेस, उदयपुर (Udaipur) के मुख्य प्रवेश द्वार बड़ीपोल पर अन्नपूर्णामाताजी महाराणा अमर सिंह प्रथम के समय में विक्रम सं. 1665 सन् 1608 आसोजसुद को की गई. तभी से यहाँ नियमित पूजा-अर्चना होती है. यहाँ स्थापित मातेश्वरी की श्वेत पाषाण प्रतिमा अत्यन्त ही मनोहारी एवं चमत्कारिक है. प्रतिवर्ष आसोजी नवरात्रि में यहाँ नौ दिन तक विशेष पूजा अर्चना होती है.

विन्द्यवासिनीमाताजी, कैलाशपुरी

कैलाशपुरी स्थित परमेश्वराजी महाराज एकलिंगजी के मुख्य मंदिर के परकोटे के बाहर उत्तर में विन्द्यवासिनीजी का मंदिर बना हुआ है. महर्षि हारीत राशि के इन देवी की आराधना करने संबंधी विवरण से इनको पाशुपत सम्प्रदाय की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है. माता की श्याम शिला पर खनित सपरिकर प्रतिमा कला की दृष्टि से विशिष्ट महत्त्व रखती है. गर्भगृह के बाहरी भाग में मंदिर के द्वार के दोनों तरफ कंकाल भैरव विराजमान है- माता के सम्मुख माता का वाहन धर्म का प्रतीक सिंह स्थापित है, भगवान एकलिंगजी की त्रिकाल पूजा होने के बाद इनकी पूजा की जाती है.

कालिका माताजी, चित्तौड़गढ़

यह मंदिर वि.स.ं की दसवीं शताब्दी के आसपास का बना हुआ है. यद्यपि यह मंदिर एकलिंगजी ट्रस्ट के स्वामित्व का नहीं है किन्तु ट्रस्ट की ओर से यहाँ नियमित सेवा-पूजा करवाई जाती है तथा दोनों नवरात्र के अवसर पर यहाँ ट्रस्ट की ओर से नौ दिन तक विशिष्ट अनुष्ठान एवं यज्ञादि सम्पन्न करवाये जाते हैं. महाराणा प्रायः नवरात्रि के दौरान यहां दर्शन करने पधारते थे.

अम्बामाताजी, उदयपुर (Udaipur)

उदयपुर (Udaipur) के प्रमुख शक्तिस्थल के रूप में विख्यात अम्बामाताजी की प्रतिष्ठा संवंत 1721 में हुई थी. मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा राजसिंह प्रथम ने अम्बामाता की प्रतिमा आरासण (गुजरात (Gujarat)) से लाकर यहाँ प्रतिष्ठापित करवाई थी. दोनों नवरात्र के साथ ही यहाँ वर्ष पर्यन्त एकलिंगजी ट्रस्ट की ओर से विशेष पूजन अर्चना की व्यवस्था है. समय-समय पर मेवाड़ के लगभग सभी महाराणा यहाँ दर्शनार्थ पधारते रहे हैं. महाराणा जवान सिंह जी तो माता के अनन्य उपासक थे, इन्होंने माताजी के अनेक छन्द और स्तुतियां रचकर माता के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित किये हैं. नवरात्रि की पंचमी को महाराणा साहब शाम 5 बजे पूर्ण लवाजमें के साथ व देवी के दर्शन को पधारते थे.

आसावरा माताजी

मेवाड़ के शक्तिपीठों में आसावरामाता जी का प्रमुख स्थान है. चैदहवीं शताब्दी पूर्व बने इस मंदिर में मातेश्वरी की श्वेत पाषाण प्रतिमा विराजमान है जिसका स्वरूप महिषासुर मर्दिनरी का प्रतीत होता है. रियासतकाल में जब भी महाराणा का चित्तौड़ पधारना होता था तब यहाँ भी दर्शन करने आते थे. मंदिर के ठीक सामने पूर्व दिशा में एक तालाब है जिसके जल के बारे में यह विख्यात है कि इसमें स्नान करने वालों के लकवां एवं लकवा संबंधी अन्य रोगों का चमत्कारिक ढंग से शमन होता है. इसी चमत्कारिक प्रभाव के चलते न केवल मेवाड़ एवं राजस्थान (Rajasthan) वरन् देश के विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पूर्ण आस्था लेकर आते है और स्वास्थ्य लाभ लेकर लौटते है. एकलिंगजी ट्रस्ट के स्वामित्व का यह मंदिर ट्रस्ट द्वारा ही प्रबंधित है. ट्रस्ट की ओर से यहां नियमित सेवा-पूजा एवं अन्य गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं.
एकलिंगजी ट्रस्ट के वर्तमान अध्यक्ष एवं प्रबंध न्यासी अरविन्द सिंह जी मेवाड़ के कुशल मार्गदर्शन में सम्पूर्ण मंदिर परिसर एवं यहां स्थित धर्मशालाओं के अच्छे रख-रखाव के साथ ही यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं एवं बीमार व्यक्तियों को विविध सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जा रही हैं.

दशमुखा कालिका माताजी ( एकलिंगजी परिसर)

परमेश्वराजी महाराज एकलिंगजी मंदिर परिसर में ही अम्बामाताजी के समीप दशमुखा कालिका माताजी का मंदिर है. दशभुजा तथा दशमुखा कालिका माता श्याम शिला पर उत्कीर्ण हैं. दशमहाविद्याओं में कालि प्रथम विद्या है, अतः तांत्रिक जगत में आद्याशक्ति की संज्ञा से अभिहित है. एकलिंगजी ट्रस्ट द्वारा यहां दोनों नवरात्र मनाई जाती हैं.

शीतलामाता मंदिर, उदयपुर (Udaipur)

महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) ने उदयपुर (Udaipur) के देलवाड़ा की हवेली के पास शीतलामाता का मंदिर बनवाया. जब बालकों को चेचक निकलती हैं तो गृहणियाँ शीतला माता की पूजा करती हैं, ठण्डा नैवेद्य भोग लगाती हैं और ठण्डा खाती हैं. इससे शरीर में शांति होकर रोगी इस रोग से मुक्त हो जाते हैं.

चौथमाताजी (जनाना महल)

उदयपुर (Udaipur) के राजमहलों में जनाना महल के पश्चिम अहाते में चौथमाताजी की देवरी बनी हुई है, जिसमें चौथमाताजी स्थापित है. देवरी में जो कांच लगाये गये है वे महाराणा स्वरूपसिंह जी एवं महाराणा सज्जन सिंह जी के समय के लगाये जाने का विवरण मिलता है.

हस्तमाताजी उदयपुर (Udaipur)

उदयपुर (Udaipur) में अवस्थित हस्तमाता जी भी मेवाड़ के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल हैं. मेवाड़ के महाराणा कर्णसिंह (वि.सं. 1620-28) के शासनकाल में निर्मित यह मंदिर उदयपुर (Udaipur)-चित्तौड़गढ़ मार्ग पर महाराणा भूपाल महाविद्यालय के पीछे स्थित है. हस्तमाताजी देवी दुर्गा का ही एक स्वरूप है. महाराणा प्रत्येक नवरात्रि की सप्तमी के दिन देवी दर्शन हेतु पधारते थे. यह मंदिर भी एकलिंगजी ट्रस्ट के स्वामित्व का है तथा ट्रस्ट की ओर से यहाँ नियमित सेवा-पूजा करवाई जाती हैं. दोनों नवरात्र के अवसर पर ट्रस्ट की ओर से नौ दिन तक विशिष्ट अनुष्ठान एवं यज्ञादि सम्पन्न करवाये जाते हैं. हाल ही में इस मंदिर का एकलिंगजी ट्रस्ट की ओर से जीर्णोद्धार करवाया गया है.