जनता का मंत्र: जब लोकतंत्र का मंत्र जंतर-मंतर पर लौटा

New Delhi, 27 जुलाई . New Delhi के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुआ छात्र जमावड़ा महज परीक्षा विवाद के विरोध में प्रदर्शन नहीं था. यह एक Political और सामाजिक जागृति का क्षण था, जिसे तात्कालिक मुद्दे से परे जाकर समझना जरूरी है. छात्र भले ही अंततः अपनी कक्षाओं में लौट जाएं, लेकिन जंतर-मंतर उनकी सामूहिक चेतना में समा गया है. यह महज एक स्थान नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन गया है.

जंतर-मंतर शब्द अपने आप में एक गहरा अर्थ रखता है. ऐतिहासिक रूप से यह India की प्रसिद्ध खगोलीय वेधशाला है, लेकिन आम धारणा में यह शब्द जंतर (एक उपकरण) और मंत्र (एक शक्ति या आह्वान) दोनों का भाव जगाता है. लोकतंत्र भी इसी संयोजन से कार्य करता है. संस्थाएं इसके उपकरण हैं, लेकिन जनता की आवाज इसका मंत्र है. जब संस्थाएं उस आवाज को प्रसारित करने में विफल रहती हैं, तो मंत्र सड़कों पर लौट आता है. ठीक यही हुआ.

एक परीक्षा से परे इस आंदोलन की तात्कालिक वजह परीक्षा में अनियमितताओं के आरोप हो सकते हैं, लेकिन यह आंदोलन जल्द ही एक परीक्षा के मुद्दे से आगे निकल गया. इसने एक व्यापक मुद्दे को प्रतिबिंबित किया—India के मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग की चिंता, जिनके सपने शिक्षा, योग्यता और अवसरों पर टिके हैं.

पहले के कई Political आंदोलनों के विपरीत, इस आंदोलन का कोई स्पष्ट वैचारिक नेतृत्व नहीं था. इसे निर्देशित करने वाली कोई एक Political पार्टी नहीं थी, न ही कोई जातिगत लामबंदी थी, न ही कोई धार्मिक नारा इसे परिभाषित करता था. छात्र स्वेच्छा से India भर के छोटे कस्बों और शहरों से आए, अक्सर अपने खर्च पर. वे उन परिवारों का प्रतिनिधित्व करते थे, जिन्होंने शिक्षा में अपना सब कुछ लगा दिया है क्योंकि उनका मानना ​​है कि यही सम्मान और सामाजिक उन्नति का एकमात्र मार्ग है.

जब वह मार्ग अनिश्चित प्रतीत होता है, तो असुरक्षा अस्तित्वगत हो जाती है. इसलिए यह विरोध प्रदर्शन केवल एक परीक्षा के बारे में नहीं, बल्कि संस्थानों में विश्वास के बारे में था. प्रत्येक लोकतंत्र को एक ऐसे मंच की आवश्यकता होती है, जहां आम नागरिकों की आवाज सुनी जा सके, इससे पहले कि उनकी निराशा अलगाव में बदल जाए. संसद संवैधानिक रूप से वह मंच है. Political दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनता की चिंताओं को बुलंद करें. मंत्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वे उनका जवाब दें. नौकरशाही से अपेक्षा की जाती है कि वे समस्याओं को संकट बनने से पहले ही हल कर दें. जब ये माध्यम अपर्याप्त प्रतीत होते हैं, तो नागरिक स्वाभाविक रूप से एक अन्य मंच की तलाश करते हैं. जंतर-मंतर वही मंच बन गया.

एमएस/

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