यादों में वसुंधरा ताई: छोटी उम्र की चाह… आगे चलकर बनीं हिंदुस्तानी संगीत की पहचान

Mumbai , 28 जुलाई . भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो सिर्फ अपनी कला से नहीं बल्कि अपनी साधना और समर्पण से भी याद किए जाते हैं. वसुंधरा कोमकली जिन्हें प्यार से वसुंधरा ताई कहा जाता था, ऐसा ही एक नाम है. उनकी आवाज में मिठास थी, गायकी में गहराई थी और संगीत के प्रति ऐसा समर्पण था, जिसने उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई.

23 मई 1931 को Jharkhand के जमशेदपुर में जन्मी वसुंधरा कोमकली ने बहुत छोटी उम्र में संगीत की साधना शुरू कर दी था. जब वह महज 12 साल की थी तब उनकी मुलाकात मशहूर शास्त्रीय गायक कुमार गंधर्व से हुई थी. यही मुलाकात उनके जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुई.

कहा जाता है कि कोलकाता में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में वसुंधरा ने पहली बार कुमार गंधर्व को सुना. उनकी गायकी ने वसुंधरा के मन पर ऐसा असर डाला कि उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि उन्हें भी शास्त्रीय संगीत सीखना है. उन्होंने कुमार गंधर्व से सीखने की इच्छा जताई. हालांकि, परिस्थितियां उस समय उनके साथ नहीं थीं और Mumbai जाकर सीखने का सपना तुरंत पूरा नहीं हो सका.

हालांकि संगीत के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ. उन्होंने कोलकाता में रहकर अपनी संगीत साधना जारी रखी. कम उम्र में ही उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़कर अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी. उनकी आवाज में ऐसी मिठास और सुरों पर ऐसी पकड़ थी कि धीरे-धीरे संगीत प्रेमियों के बीच उनका नाम पहचाना जाने लगा.

साल 1946 में वसुंधरा ताई Mumbai पहुंचीं और प्रसिद्ध संगीतज्ञ प्रोफेसर बी.आर. देवधर से संगीत की शिक्षा ली. इसके बाद उन्होंने कुमार गंधर्व से भी संगीत की बारीकियां सीखीं. लंबे समय तक साथ काम करने और संगीत की साधना करने के बाद साल 1962 में दोनों विवाह के बंधन में बंध गए.

वसुंधरा ताई को अक्सर कुमार गंधर्व की संगिनी के रूप में याद किया जाता है लेकिन उनकी अपनी पहचान भी उतनी ही मजबूत थी. वह सिर्फ एक महान कलाकार के साथ खड़ी रहने वाली शख्सियत नहीं थीं बल्कि खुद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की एक सशक्त आवाज थीं. उन्होंने ख्याल गायकी के साथ-साथ भजन, लोकगीत और पारंपरिक संगीत को भी अपनी खास शैली में प्रस्तुत किया.

कुमार गंधर्व के साथ मंच साझा करते हुए उन्होंने कई वर्षों तक संगीत प्रेमियों को अपनी कला से प्रभावित किया. शुरुआत में वह उनके साथ तानपुरा संभालती थीं और सुरों में साथ देती थीं लेकिन धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा ने उन्हें खुद एक बड़े कलाकार के रूप में स्थापित कर दिया.

वसुंधरा ताई की गायकी में परंपरा और प्रयोग का खूबसूरत मेल देखने को मिलता था. भारतीय संगीत में उनके योगदान को देखते हुए India Government ने साल 2006 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया. इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया.

29 जुलाई 2015 को Madhya Pradesh के देवास स्थित अपने घर पर कार्डियक अरेस्ट के कारण वसुंधरा कोमकली का निधन हो गया. वह भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी संगीत विरासत आज भी आगे बढ़ रही है. उनकी बेटी कलापिनी कोमकली भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका हैं और परिवार की संगीत परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं.

पीआईएम/पीएम

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