Skip to content
Tuesday, 3 November 2026
Hindi Daily Kiran India, Rajasthan, business, sports, tech और अन्य श्रेणियों की ताज़ा हिन्दी ख़बरें।
BREAKING
आईएएनएस स्पेशल,फीचर्स,राजनीति,राष्ट्रीय

विनायकराव पटवर्धन: संगीत साधना से रंगमंच और फिर गुरु-सेवा तक का सफर

विनायकराव पटवर्धन: संगीत साधना से रंगमंच और फिर गुरु-सेवा तक का सफर

New Delhi, 22 अगस्त . हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कुछ कलाकार सिर्फ अपनी आवाज के लिए नहीं, बल्कि संगीत को समाज तक पहुंचाने के लिए याद किए जाते हैं. ऐसी ही बहुआयामी शख्सियत विनायकराव पटवर्धन थे.

उन्होंने गायक, शिष्य, गुरु, Actor और संगीत प्रचारक के रूप में आधी सदी से अधिक लंबे करियर में संगीत की सेवा की. 23 अगस्त 1975 को पुणे में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी संगीत यात्रा आज भी प्रेरणा देती है.

22 जुलाई 1898 को Maharashtra के मिरज में जन्मे विनायकराव ग्वालियर घराने से जुड़े थे. 1902 में मां के निधन के बाद उनका पालन-पोषण चाचा ने किया. उन्होंने 1905 में केशवराव कोरटकर से संगीत सीखना शुरू किया और 1907 में लाहौर के गंधर्व महाविद्यालय में विष्णु दिगंबर पलुस्कर के शिष्य बने.

पलुस्कर द्वारा Mumbai में शाखा खोलने के बाद, वे 1908 में Mumbai पहुंचे और 1919 में ‘संगीत प्रवीण’ डिप्लोमा हासिल किया. इस दौरान बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर और रहमत खान जैसे ग्वालियर घराने के दिग्गजों से भी सीखने का अवसर मिला.

विनायकराव केवल गायक नहीं थे. वह हारमोनियम, तबला, सितार और वायलिन बजाने में भी दक्ष थे. उन्होंने मराठी संगीत नाटकों में अभिनय किया और कथक का बुनियादी प्रशिक्षण भी लिया.

वह 25 वर्ष की उम्र में नागपुर के गंधर्व महाविद्यालय के प्रिंसिपल बने, हालांकि उनका कार्यकाल केवल एक वर्ष रहा. 1922 में वह ‘गंधर्व नाटक मंडली’ से जुड़े और करीब दस वर्षों तक लोकप्रिय नाटकों में अभिनय किया. शुरुआत में वह इसलिए झिझके क्योंकि संगीत उनका मुख्य जुनून था और उन्हें गुरु पलुस्कर की प्रतिक्रिया की चिंता थी. पलुस्कर को भी डर था कि थिएटर उनके संगीत और व्यक्तित्व पर असर डाल सकता है, लेकिन अंततः अनुमति मिल गई.

1931 में पलुस्कर के निधन के बाद, पटवर्धन ने संगीत प्रचार को गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि माना. उन्होंने अन्य शिष्यों के साथ ‘गंधर्व महाविद्यालय मंडल’ बनाया और इसके पहले अध्यक्ष बने. उन्होंने पुणे में नया गंधर्व महाविद्यालय शुरू किया और 1942 तक उसका प्रबंधन संभाला. उन्होंने पुणे और मिरजी में दो और संस्थान स्थापित किए.

मार्च 1926 में साबरमती में महात्मा गांधी के सामने उन्होंने दो गीत प्रस्तुत किए. 1954 में, सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल के साथ, उन्होंने सोवियत संघ, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया में संगीत कार्यक्रम किए.

दमदार आवाज और शास्त्रीय अनुशासन के साथ रचनात्मक स्वतंत्रता ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई. वह 1965 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और 1972 में पद्म भूषण से सम्मानित हुए. 23 अगस्त 1975 को उनका निधन हुआ, लेकिन संगीत को समर्पित उनकी विरासत आज भी जीवित है.

–

पीएसके/एबीएम

Share