
New Delhi, 11 फरवरी . Supreme Court ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ को चुनौती देने वाली दो नई याचिकाओं पर केंद्र Government और यूजीसी को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने इन याचिकाओं को पहले से लंबित पुरानी याचिकाओं के साथ जोड़कर एक साथ सुनने का निर्देश दिया है.
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं. खासकर नियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों तक सीमित रखी गई है. इससे सामान्य वर्ग के लोगों को भेदभाव की शिकायत करने का कोई कानूनी संरक्षण नहीं मिलता, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के अधिकार के खिलाफ है.
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह नियम एकतरफा है और उच्च शिक्षा में सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकता है. इससे पहले, Supreme Court ने जनवरी 2026 में नए नियमों के अमल पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने कहा था कि नियमों के प्रावधान अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका है.
अदालत ने केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था और नियमों पर नए सिरे से विचार करने के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित करने का सुझाव दिया था. फिलहाल, 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे, ताकि जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों पर कोई रोक न लगे.
यूजीसी ने 13 जनवरी को ये नए नियम जारी किए थे, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, दिव्यांगता आदि पर आधारित भेदभाव रोकना और समानता को बढ़ावा देना था, लेकिन सामान्य वर्ग से जुड़े कई छात्रों और संगठनों ने इसका विरोध किया और इसे ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ बताया.
विरोध के बाद मामला Supreme Court पहुंचा, जहां अब सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होगी.
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