‘महिला आरक्षण का नहीं, बल्कि यह चुनावी फायदे से जुड़ा हुआ है’, नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर बोलीं इकरा हसन

New Delhi, 16 अप्रैल . Samajwadi Party की सांसद इकरा हसन ने Lok Sabha में पेश किए गए ‘नारी शक्ति वंदन’ अधिनियम और परिसीमन (डीलिमिटेशन) एवं जनगणना को लेकर Government पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक 2023 में सर्वसम्मति से पारित हो चुका है, इसलिए अब मुद्दा महिला आरक्षण का नहीं है, बल्कि यह चुनावी फायदे से जुड़ा हुआ है.

इकरा हसन ने आरोप लगाया कि Government आरक्षण को परिसीमन और जनगणना के आड़ में छिपा रही है, और यह महिलाओं के अधिकारों के साथ धोखा है. उन्होंने कहा कि पहले Government ने कहा था कि महिला आरक्षण 2034 के बाद लागू होगा, और अब इसे 2029 में लागू करने की बात की जा रही है, जो विरोधाभासी है.

उन्होंने सवाल उठाया कि 2023 के बाद तीन वर्षों में ऐसा क्या बदल गया कि Government अब नई जनगणना की आवश्यकता से पीछे हट रही है. उनके अनुसार, यह बदलाव महिलाओं के अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि चुनावी लाभ के लिए किया गया है.

सांसद ने कहा कि जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन इसमें देरी हुई और अब Government 2011 के पुराने आंकड़ों के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करना चाहती है, जो 2029 तक 18 साल पुराने हो जाएंगे. उन्होंने इसे पुराने आंकड़ों पर आधारित अन्यायपूर्ण व्यवस्था बताया.

उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 82, 81 और 170 यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर हो, लेकिन इस विधेयक से ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ का सिद्धांत प्रभावित हो सकता है.

इकरा हसन ने परिसीमन आयोग को दी जा रही शक्तियों पर भी सवाल उठाए और कहा कि स्थिति और चिंताजनक हो जाती है जब हम परिसीमन आयोग को दी जा रही शक्तियों का आकलन करते हैं. यह आयोग सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोनों का निर्णय करेगा, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस निर्णय को किसी भी न्यायालय में हम चुनौती नहीं दे सकते. इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहां सत्ता पक्ष पूरे देश के पॉलिटिकल मैप को अपने लाभ के लिए बदल सकती है, वह भी बिना किसी न्यायिक निगरानी के. आज सीमाएं तय करेंगी कि कौन किसका प्रतिनिधित्व करेगा, किस समुदाय की आवाज सुनी जाएगी और किसकी नहीं.

उन्होंने यह भी कहा कि महिलाएं कोई होमोजेनियस ग्रुप नहीं हैं. वे एक समान एक रूप समूह नहीं हैं. उनकी वास्तविकताएं जाति, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि से निर्धारित होती हैं. फिर भी यह विधेयक इस वास्तविकता को नजरअंदाज करता है और पीडीए समुदाय, विशेषकर ओबीसी महिलाओं को पूरी तरह बाहर कर देता है, जो इस देश की बहुत बड़ी आबादी है. यह इस विधेयक की संरचना में एक गंभीर कमी है.

उन्होंने मुलायम सिंह यादव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि सामाजिक न्याय के बिना ओबीसी कोटे के बिना महिला आरक्षण का लाभ सिर्फ एक सीमित दायरे तक रह जाएगा.

Lok Sabha की सदस्य संख्या 50 प्रतिशत बढ़ाने से संसदीय कार्यप्रणाली प्रभावित होगी और छोटे दलों की आवाज कमजोर होगी.

महिला आरक्षण को लेकर उन्होंने कहा कि महिलाएं एक समान समूह नहीं हैं और जाति, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर उनकी अलग-अलग वास्तविकताएं हैं. उन्होंने ओबीसी और वंचित वर्ग की महिलाओं के लिए उप-आरक्षण (सब-कोटा) की मांग की.

सांसद ने यह भी सुझाव दिया कि ओबीसी, अल्पसंख्यक और गरीब वर्ग की महिलाओं के लिए अलग प्रावधान किए जाएं तथा चुनावी खर्च में राज्य सहयोग दे.

एएमटी/डीकेपी

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