टैक्पेप जीन में बदलाव से चौड़ी हो जाती हैं काली धारियां, गायब हो जाता है पीला रंग, इसलिए काला दिखने लगता है बाघ – Daily Kiran
Wednesday , 20 October 2021

टैक्पेप जीन में बदलाव से चौड़ी हो जाती हैं काली धारियां, गायब हो जाता है पीला रंग, इसलिए काला दिखने लगता है बाघ

नई दिल्ली (New Delhi) . ओडिशा के सिमलिपाल में काले बाघों के रहस्य से पर्दा उठ गया है. अनुसंधानकर्ताओं ने एक जीन में ऐसे परिवर्तन की पहचान की है जिससे उनके शरीर पर विशिष्ट धारियां चौड़ी हो जाती हैं और पीले रंग की खाल तक फैल जाती है, जिससे बाघ कई बार पूरी तरह से काले नजर आने लगते हैं. ‘काले बाघ’ लंबे समय से आकर्षण का केंद्र रहे हैं. राष्ट्रीय जीव विज्ञान केंद्र (एनसीबीएस) में परिस्थिति वैज्ञानिक उमा रामकृष्णन और उनके छात्र (student) विनय सागर, बेंगलूरू ने बाघ की खाल के रंगों और प्रवृत्तियों का पता लगाया है जिससे ट्रांसमेम्ब्रेन एमिनोपेप्टाइड्स क्यू (टैक्पेप) नामक जीन में परिवर्तन से बाघ काला नजर आता है.

प्रो रामकृष्णन ने बताया इस फेनोटाइप के लिए जीन के आधार का पता लगाने का यह हमारा पहला और इकलौता अध्ययन है. चूंकि फेनोटाइप के बारे में पहले भी बात की गई है तो यह पहली बार है जब उसके जीन के आधार की वैज्ञानिक रूप से जांच की गई है. अनुसंधानकर्ताओं ने यह दिखाने के लिए भारत की अन्य बाघ आबादी के जीन का विश्लेषण और कम्प्यूटर अनुरूपण के आंकड़े एकत्रित किए कि सिमलीपाल के काले बाघ बाकी बाघों से किस तरह से अलग हैं.

अध्ययन में कहा गया है कि सिमलीपाल बाघ अभयारण्य में बाघ पूर्वी भारत में एक अलग आबादी है और उनके तथा अन्य बाघों के बीच जीन का प्रवाह बहुत सीमित है. रामकृष्णन की प्रयोगशाला में पीएचडी के छात्र (student) और शोधपत्र के मुख्य लेखक सागर ने कहा हमारी जानकारी के मुताबिक काले बाघ दुनिया के किसी अन्य स्थान पर नहीं पाए जाते. ऐसे बाघों में असामान्य रूप से काले रंग को स्यूडोमेलेनिस्टिक या मिथ्या रंग कहा जाता है. सिमलीपाल में बाघ के इस दुर्लभ परिवर्तन को लंबे समय से पौराणिक माना जाता है. बाघों की 2018 की गणना के अनुसार, भारत में अनुमानित रूप से 2,967 बाघ हैं. सिमलीपाल में 2018 में ली गयी तस्वीरों में आठ विशिष्ट बाघ देखे गए जिनमें से तीन ‘स्यूडोमेलेनिस्टिक’ बाघ थे.

अनुसंधानकर्ताओं ने यह समझने के लिए भी जांच की कि अकेले सिमलीपाल में ही बाघों की त्वचा के रंग में यह परिवर्तन क्यों होता है. एक अवधारणा है कि उत्परिवर्ती जीव की गहरे रंग की त्वचा उन्हें घने क्षेत्र में शिकार के वक्त फायदा पहुंचाती है और बाघों के निवास के अन्य स्थानों की तुलना में सिमलीपाल में गहरे वनाच्छादित क्षेत्र में हैं. इस अध्ययन में अमेरिका में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, हडसनअल्फा इंस्टीट्यूट फॉर बायोटेक्नोलॉजी, भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, तिरुपति, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद, हैदराबाद और भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून (Dehradun) के वैज्ञानिक भी शामिल थे.

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