10 साल में 6 पीएम! अब सातवें की बारी, आखिर ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बार-बार क्यों बदले?

New Delhi/लंदन, 22 जून . ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर ने सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए Monday को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर इस्तीफे की घोषणा करते हुए काफी भावुक भी दिखे. इसके साथ ही, 10 डाउनिंग स्ट्रीट से पिछले 10 साल में विदा होने वाले छठे पीएम बन गए.
लंदन स्थित 10 डाउनिंग स्ट्रीट लगभग 300 वर्षों से ब्रिटेन के प्रधानमंत्रियों का आधिकारिक आवास रहा है. कभी यहां विंस्टन चर्चिल ने नौ साल बिताए, तो मार्गेट थैचर करीब 12 वर्षों तक रहीं. टोनी ब्लेयर ने भी एक दशक तक इसी पते से देश का नेतृत्व किया.
पिछले एक दशक में हालात पूरी तरह बदल गए हैं. 2016 से अब तक छह Prime Minister बदल चुके हैं और सिर्फ चार वर्षों में चार अलग-अलग नेता इस पद पर आ चुके हैं.
सवाल उठता है कि आखिर ब्रिटेन में Prime Minister बार-बार क्यों बदल रहे हैं? तो इसकी वजह जानने के लिए पिछले 10 वर्षों के पन्ने पलटने होंगे और उस व्यवस्था को समझना होगा जो ब्रिटेन के लोकतंत्र का अंग है. दरअसल, ब्रिटेन में जनता सीधे Prime Minister का चुनाव नहीं करती. मतदाता संसद के निचले सदन, यानी हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए सांसद चुनते हैं. जिस पार्टी को बहुमत मिलता है, उसका नेता Prime Minister बनता है.
यदि किसी पार्टी के सांसद अपने नेता पर विश्वास खो देते हैं, तो पार्टी आंतरिक चुनाव के जरिए उसे हटा सकती है. ऐसे में Prime Minister को भी पद छोड़ना पड़ता है, भले ही आम चुनाव न हुए हों.
Political अस्थिरता की शुरुआत ‘ब्रेक्जिट रेफरेंडम’ से शुरू होती है. 2016 में तत्कालीन पीएम डेविड कैमरून ने खुद को यूरोपीय संघ में बनाए रखने के लिए जनमत संग्रह कराया. लेकिन हुआ उनकी सोच के उलट, लोगों ने ब्रिटेन के एग्जिट, यानी ब्रेक्जिट, की राह आसान कर दी. नतीजा आने के बाद कैमरून ने इस्तीफा दे दिया.
ब्रेक्जिट ने ब्रिटिश राजनीति की पारंपरिक संरचना को झकझोर दिया. कई मतदाता अपनी पुरानी Political निष्ठाओं से दूर हो गए और देश की राजनीति अधिक ध्रुवीकृत हो गई.
कैमरून के बाद सत्ता संभाली थेरेसा मे ने, लेकिन ब्रेक्जिट को लागू करने को लेकर अपनी ही पार्टी के भीतर मतभेदों से जूझती रहीं और 2019 में उन्हें पद छोड़ना पड़ा.
इसके बाद बोरिस जॉनसन ने “गेट ब्रेक्जिट डन” के नारे के साथ सत्ता संभाली. हालांकि, उनके कार्यकाल में आव्रजन कम होने के बजाय रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया. बाद में कोविड लॉकडाउन के दौरान Governmentी पार्टियों से जुड़े “पार्टीगेट” विवाद और अन्य आरोपों के कारण उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा.
उनके बाद लिज ट्रस Prime Minister बनीं. ब्रिटिश संसदीय इतिहास का सबसे छोटा कार्यकाल इन्हीं का साबित हुआ. विवादास्पद “मिनी बजट” के कारण वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल मच गई और उन्हें महज 45 दिनों में पद छोड़ना पड़ा.
फिर आए भारतीय मूल के ऋषि सुनक. 2022 में Prime Minister बनने के बाद उन्होंने पांच वायदे किए. इनमें से दो पूरे भी किए: पहला मुद्रास्फीति कम करने का और दूसरा अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का. वहीं, Governmentी ऋण को कम करने, एनएचएस की प्रतीक्षा सूची को कम करने और इंग्लिश चैनल के पार छोटी नावों में ब्रिटेन आने वाले अप्रवासियों को रोकने का वादा पूरा नहीं कर पाए.
पिछले प्रधानमंत्रियों की नीतियों और बार-बार बदलते पीएम की वजह से महंगाई बढ़ती गई, जिससे उनकी Government को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. नतीजतन, 20 महीने पीएम रहने के बाद, 2024 के आम चुनाव में उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा.
जुलाई 2024 में कीर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने भारी मतों से जीत दर्ज की और सत्ता में वापसी की. हालांकि, दो साल से भी कम समय में उनकी Government पर भी दबाव बढ़ गया. स्थानीय चुनावों में खराब प्रदर्शन, पार्टी के भीतर असंतोष और कई वरिष्ठ नेताओं के इस्तीफों ने उनकी स्थिति को कमजोर कर दिया.
अंततः 22 जून 2026 को इस्तीफा का मुश्किल फैसला लेना ही पड़ गया. इस दौर में रिफॉर्म यूके और उसके नेता नाइजेल फैरज का नाम जोरों शोरों से गूंजा. स्थानीय चुनावों में उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया और कहा जाने लगा कि अब अगले पीएम वही बनेंगे. लेकिन फिर जो हुआ उसने लेबर पार्टी की उम्मीदों को तो जगा दिया लेकिन स्टार्मर की कुर्सी हिलाने का काम कर दिया.
ये नया नाम एंडी बर्नहैम का है, जिन्होंने हाल ही में उत्तरी इंग्लैंड के मेकरफील्ड निर्वाचन क्षेत्र में हुए उपचुनाव में अच्छी खासी जीत हासिल की. इतना ही नहीं, उन्होंने अपने टक्कर में खड़े रिफॉर्म यूके के कैंडिडेट को पराजित किया और लेबर पार्टी के इकबाल में इजाफा किया.
ब्रिटेन में अगला आम चुनाव 2029 में होना है. इससे पहले लेबर पार्टी को एंडी में आशा की नई किरण दिखने लगी है.
जैसा कि स्टार्मर ने अपने भाषण में कहा, “लेबर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (एनईसी) 9 जुलाई से नामांकन प्रक्रिया शुरू करेगी. यह प्रक्रिया संसद के ग्रीष्मकालीन अवकाश से पहले पूरी कर ली जाएगी, जो 16 जुलाई से शुरू होने की संभावना है.” ऐसे में तय है कि अगर बर्नहैम के सामने कोई चुनौती पेश नहीं की होती है तो हो सकता है 17 जुलाई को ब्रिटेन को अपना नया Prime Minister मिल जाए!
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केआर/


