विदिशा का अनोखा गांव ‘रावन’, जहां नहीं होता रावण दहन, ग्राम देवता मानकर पूजा करते हैं लोग

विदिशा, 19 अक्टूबर . देशभर में जहां विजयादशमी (दशहरे) पर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है और रावण के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं, Madhya Pradesh के विदिशा जिले की नटेरन तहसील में स्थित ‘रावन गांव’ में परंपरा और आस्था का एक अनूठा रूप देखने को मिलता है. इस गांव में दशहरे पर रावण दहन नहीं होता और न ही पटाखे गूंजते हैं, क्योंकि यहां के ग्रामीण रावण दहन को देखना या करना अशुभ मानते हैं. गांव वालों के लिए रावण एक पुतला नहीं, बल्कि उनके इष्ट देवता, ग्राम देवता और आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं, जिन्हें वे श्रद्धापूर्वक ‘रावण बाबा’ कहते हैं.
गांव के बीचों-बीच परमार कालीन प्राचीन मंदिर स्थित है, जहां रावण बाबा की लगभग 12 फीट लंबी प्रतिमा विश्राम मुद्रा (लेटी हुई अवस्था) में विराजमान है. इस मंदिर में हर सुबह-शाम पूर्ण विधि-विधान से आरती और पूजा-अर्चना की जाती है. गांव में कोई भी शुभ कार्य, चाहे विवाह हो, धार्मिक अनुष्ठान हो या नए वाहन की खरीद, रावण बाबा के प्रथम आमंत्रण और पूजन के बिना शुरू नहीं होता. विवाह के समय शादी का पहला निमंत्रण कार्ड रावण बाबा को अर्पित किया जाता है और प्रतिमा की नाभि में तेल चढ़ाकर शुभ कार्य की शुरुआत होती है.
मान्यता है कि रावण बाबा के आशीर्वाद के बिना कोई भी मांगलिक कार्य निर्विघ्न संपन्न नहीं हो सकता. गांव में भक्ति और जुड़ाव इस कदर है कि ब्राह्मण परिवार स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं और युवा अपनी गाड़ियों पर ‘जय लंकेश’ लिखवाने के साथ-साथ शरीर पर भगवान लंकेश के चित्र व नाम के टैटू बनवाते हैं. दशहरे के पावन पर्व पर यहां रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और विशेष महाभंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें विदिशा, Bhopal और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु रावण बाबा के दर्शन व प्रसाद ग्रहण करने पहुँचते हैं.
रावण बाबा मंदिर के पंडित नरेश तिवारी ने समाचार एजेंसी को बताया, “रावण बाबा महाराज प्राचीन काल से यहां विराजमान हैं और पूरा गांव उनकी छत्रछाया में निवास करता है. वे हमारे ग्राम देवता हैं और उन्हीं की कृपा से गांव के सभी शुभ कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं. विवाह, नए वाहन की पूजा या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत यहीं से की जाती है. जो लोग मनोकामनाएं लेकर आते हैं, उनकी मन्नतें पूरी होती हैं. दशहरे पर यहां भव्य भंडारा, भजन-कीर्तन और आरती का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से भक्तगण दर्शन के लिए आते हैं.”
ग्राम रावण और बमोरी के सरपंच प्रतिनिधि राजेश धाकड़ का कहना है कि रावण गांव की पहचान यहां स्थापित रावण बाबा की प्राचीन प्रतिमा से ही है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रावण बाबा ने यहां आकर एक बलशाली दैत्य का घमंड चूर किया था और फिर विश्राम मुद्रा में स्थापित हुए थे. हमारे गांव में युवा अपनी गाड़ियों पर ‘जय लंकेश’ लिखवाते हैं और हाथों पर टैटू बनवाते हैं. शादी-विवाह का पहला निमंत्रण भी रावण बाबा को ही दिया जाता है. दशहरे पर गांव का हर व्यक्ति, चाहे वह बाहर ही क्यों न रहता हो, यहां निश्चित रूप से आकर भंडारे और पूजन में शामिल होता है.
एक ग्रामीण गोविंद नारायण तिवारी ने कहा कि हम रावण महाराज को अपने प्रधान देवता और इष्ट देव के रूप में पूजते हैं. हमारे गांव में कोई भी व्यक्ति न तो रावण दहन देखने जाता है और न ही गांव में दहन होता है. हर शुभ कार्य से पहले रावण बाबा की पूजा की जाती है और शादी के समय सबसे पहले तेल-हल्दी का न्योता बाबा को ही चढ़ाया जाता है. दशहरे के दिन गांव के हर घर से लोग मंदिर आकर पूजन-अर्चन करते हैं, रामायण पाठ और कीर्तन किया जाता है तथा महाप्रसाद वितरित होता है.
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