असम की होकर भी बिहार की संस्कृति से है खास लगाव, कल्पना पटवारी बोलीं- ‘यहां की विरासत पर है गर्व’

Mumbai , 8 नवंबर . लोक संस्कृति और लोक गीतों की अपनी एक अलग पहचान होती है. ये किसी क्षेत्र की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का काम करते हैं. लोक गायिका कल्पना पटवारी का भी बिहार की लोकसंस्कृति से कुछ ऐसा ही गहरा जुड़ाव है. असम से ताल्लुक रखने के बावजूद उनके दिल में बिहार की मिट्टी, यहां की परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए खास जगह है. इसी कड़ी में वह छठ महापर्व के अवसर पर बिहार की पांच भाषाओं में सात छठ गीतों की विशेष ‘छठ गीतमाला’ लेकर आ रही हैं.
कल्पना पटवारी की इस खास प्रस्तुति में मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका और बज्जिका भाषाओं के पारंपरिक छठ गीत शामिल किए गए हैं. बिहार की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को समर्पित यह वीडियो जल्द ही म्यूजिक बॉक्स के यूट्यूब चैनल पर रिलीज होगा. एक ही गायिका द्वारा बिहार की पांच अलग-अलग भाषाओं में सात छठ गीतों को प्रस्तुत करना अपने आप में एक दुर्लभ प्रयास है.
कल्पना पटवारी ने कहा, “मैं असम की रहने वाली हूं लेकिन मुझे बिहार की संस्कृति और यहां की पुरानी परंपराओं से बहुत लगाव है. बिहार Government के कला एवं संस्कृति विभाग से राष्ट्रीय कला पुरस्कार मिलने के बाद भी मैं बिहार की संस्कृति के लिए काम करना चाहती थीं. इसी सोच के साथ मैं इस बार छठ पर बिहार की पांच अलग-अलग भाषाओं में गीत गा रही हूं. मेरे लिए बतौर गायिका पांच भाषाओं में सात छठ गीत गाना अपने आप में खास बात है.”
इस गीतमाला में मैथिली के ‘चारि पहर राति जल थल सेविलहुं’ और ‘कातिक मास इजोरिया’, भोजपुरी के ‘जगत के पालक दीनानाथ’ और ‘दरसन मांगीला तोहार हे गंगा मैया’, मगही के ‘छोटी मुटी मालिन बेटी के भुइयां लोटे केस’, अंगिका के ‘छठि मइया अइतई अंगनमा सजन हम करबई बरतिया’ तथा बज्जिका के ‘रिमझिम बुन्दवा बरसि गेल ओरियानी मोती चूए’ गीत शामिल हैं.
इन गीतों को हृदय नारायण झा की किताब ‘छठ गीत (सर्वसौभाग्यदायकम्)’ से लिया गया है. इस किताब को छठ महापर्व को यूनेस्को की खास सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराने के लिए इन्टैक (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) की ओर से तैयार किए गए दस्तावेज में भी जगह मिली है. इस किताब में छठ पर्व से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के साथ बिहार की अलग-अलग भाषाओं के पुराने और नए छठ गीत शामिल किए गए हैं.
कल्पना पटवारी ने कहा, “बिहार सिर्फ एक राज्य नहीं है बल्कि इसकी अपनी अलग पहचान और संस्कृति है. यहां की परंपराएं, रीति-रिवाज और लोक गीत सदियों पुराने हैं. बिहार की पहचान को और आगे बढ़ाने के लिए ऐसी गीतमालाओं को बढ़ावा देना चाहिए, जिनके जरिए बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश और खासकर पूर्वी India की अलग-अलग संस्कृतियों को लोग जान सकें. इसके लिए एक बड़ा सांस्कृतिक आयोजन होना चाहिए, जिसमें बिहार की लोककला, लोकगीत और संगीत को खास जगह मिले. लोकगीतों में गौरी, अछरिया और गणपति पूजा के गीतों का भी अपना महत्व है. ऐसे गीत हमारी संस्कृति और पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं.”
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पीके/पीएम


