
New Delhi, 17 मार्च . पुरानी हिंदी फिल्मों का संगीत सुनते ही कुछ आवाजें दिल को आज भी छू जाती हैं. ऐसी ही एक मधुर और यादगार आवाज थी राजकुमारी की, जिन्होंने मात्र 10 साल की उम्र में मंच पर गाकर निर्माताओं का दिल जीत लिया और सिनेमा जगत में ‘राजकुमारी’ नाम से राज किया. 1930 से 1970 के दशक तक उन्होंने सैकड़ों गीत गाए और कई फिल्मों में अभिनय भी किया. उनकी आवाज आज भी ‘बावरे नैन’, ‘महल’, और ‘पाकीजा’ जैसे क्लासिक्स में गूंजती है.
राजकुमारी दुबे, जिनकी गिनती हिंदी सिनेमा की उन चुनिंदा पार्श्व गायिकाओं में की जाती है जिनके गाने कभी पुराने नहीं हुए. संगीत और अभिनय की दुनिया में उन्होंने शानदार छाप छोड़ी. काफी कम उम्र से ही संगीत के प्रति लगाव रखने वाली राजकुमारी ने मात्र 10 साल की छोटी सी उम्र में पहला गाना रिकॉर्ड किया और एक सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रस्तुति दी. कमाल तो तब हुआ जब छोटी बच्ची की मधुर आवाज सुनकर प्रकाश पिक्चर्स के निर्माता विजय भट्ट और प्रकाश भट्ट इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत उन्हें फिल्म से जोड़ने का फैसला किया.
राजकुमारी का जन्म 1924 में हुआ था. उन्हें औपचारिक संगीत शिक्षा नहीं मिली, लेकिन उनका स्वाभाविक सुरीला कंठ और गायन में गहरी रुचि ने उन्हें आगे बढ़ाया. एचएमवी के लिए उन्होंने अपना पहला गाना रिकॉर्ड करवाया. इसके बाद कई मंचों पर गायन करते हुए उनकी प्रतिभा लोगों तक पहुंची. प्रकाश पिक्चर्स ने उन्हें Gujaratी फिल्म ‘संसार लीला’ और हिंदी फिल्म ‘नई दुनिया’ में मौका दिया. फिल्म में उनका गीत ‘अखियां गुलाबी जैसे मधु की है प्यालियां’ काफी लोकप्रिय हुआ. साल 1933 में आई फिल्म ‘आंख का तारा’, ‘तुर्की शेर’ और 1934 में ‘भक्त और भगवान’, ‘इंसाफ की टोपी’ जैसी फिल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिकाएं निभाईं.
लल्लू भाई जैसे संगीतकारों के साथ काम करते हुए उन्होंने कई यादगार गीत गाए. बाद में प्रकाश पिक्चर्स से उनका रिश्ता टूट गया, लेकिन उन्होंने प्ले बैक सिंगिंग की राह चुनी. रत्नमाला और शोभना समर्थ जैसी अभिनेत्रियों के लिए उन्होंने कई गाने गाए.
उनके सबसे प्रसिद्ध गीतों में बावरे नैन का ‘सुन बैरी बालम सच बोल’, महल का ‘घबराना के जो हम सर को टकरायें’, पाकिजा का ‘नजरिया की मारी’, ‘चुन चुन घुंघरवा’, ‘मुझे सच सच बता दो कब मेरे दिल में समाए थे’ और ‘हरे दिन तो बीता शाम हुई’ शामिल हैं. संगीतकार रोशन ने उन्हें ‘बावरे नैन’ और ‘अनहोनी’ जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण गाने दिए. मुकेश के साथ उनके युगल गीत भी काफी लोकप्रिय हुए.
राजकुमारी ने हिंदी के अलावा बांग्ला और पंजाबी में भी गीत गाए. 1950 के दशक में लता मंगेशकर के आने के बाद पार्श्व गायन की दुनिया बदल गई, लेकिन राजकुमारी की आवाज क्लासिक फिल्मों में हमेशा के लिए अमर हो गई. उन्होंने ओपी नैय्यर के साथ भी फिल्मों में अपनी आवाज दी.
उनका विवाह वाराणसी के वीके दुबे से हुआ था. जीवन के अंतिम वर्षों में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी गायकी ने लाखों दिलों में जगह बनाई.
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एमटी/डीकेपी