
New Delhi, 3 जुलाई . India में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) के इस्तेमाल का दायरा लगातार बढ़ रहा है. इसी बीच social media पर ई20 ईंधन को लेकर पानी की खपत, खाद्य सुरक्षा, वाहन के प्रदर्शन, इंजन की सुरक्षा और पर्यावरण पर इसके प्रभाव जैसे कई दावे तेजी से वायरल हो रहे हैं. हालांकि, वैज्ञानिक अध्ययनों, तकनीकी आकलनों और Government की ओर से जारी स्पष्टीकरणों के अनुसार, इनमें से अधिकांश दावे या तो भ्रामक हैं या तथ्यात्मक रूप से गलत हैं.
social media पर सबसे ज्यादा प्रसारित दावों में से एक यह है कि एक लीटर एथेनॉल तैयार करने के लिए 10,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है. Government के अनुसार यह दावा तथ्यों पर आधारित नहीं है.
Governmentी आंकड़ों में बताया गया है कि इस दावे में धान जैसी फसलों की पूरी कृषि जल-खपत को एथेनॉल उत्पादन से जोड़ दिया जाता है, जबकि ऐसा नहीं है. धान और गेहूं जैसी फसलें मुख्य रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की खरीद व्यवस्था के कारण उगाई जाती हैं, न कि केवल एथेनॉल उत्पादन के लिए.
Government के मुताबिक, आधुनिक एथेनॉल संयंत्रों में एक लीटर एथेनॉल बनाने में केवल 3 से 5 लीटर औद्योगिक पानी की आवश्यकता होती है. साथ ही जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) तकनीक के जरिए पानी का बड़े पैमाने पर पुनर्चक्रण किया जाता है.
ई20 को लेकर एक और दावा यह किया जाता है कि यह एक नया और बिना परीक्षण वाला प्रयोग है. Government ने इसे भी खारिज किया है.
Governmentी एजेंसियों के अनुसार, एथेनॉल का उपयोग परिवहन ईंधन के रूप में 100 वर्षों से भी अधिक समय से किया जा रहा है. वर्ष 1908 में हेनरी फोर्ड की प्रसिद्ध मॉडल टी कार को एथेनॉल, पेट्रोल, केरोसिन या इनके मिश्रण पर चलने के लिए डिजाइन किया गया था.
आज अमेरिका में ई10 सामान्य ईंधन है और वहां ई15 तथा ई85 जैसे मिश्रणों का भी व्यापक उपयोग हो रहा है. ब्राजील में पहले से ई27 अनिवार्य है और वहां इसे लगभग 35 प्रतिशत तक बढ़ाने का निर्णय लिया गया है. ब्राजील में बिकने वाली 80 प्रतिशत से अधिक नई कारें फ्लेक्स-फ्यूल वाहन हैं.
इसके अलावा कनाडा, थाईलैंड, जापान और कई यूरोपीय देश भी एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर रहे हैं. ऐसे में Government का कहना है कि India का ई20 कार्यक्रम वैश्विक स्तर पर पहले से स्थापित मॉडल के अनुरूप है.
वाहनों के माइलेज को लेकर भी कई तरह की आशंकाएं सामने आई हैं.
ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई), इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसीएल), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम (आईआईपी), देहरादून और सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएएम) द्वारा किए गए संयुक्त अध्ययन में यात्री कारों पर 40,000 किलोमीटर और दोपहिया वाहनों पर 20,000 किलोमीटर तक परीक्षण किया गया.
अध्ययन में पाया गया कि ई20 के इस्तेमाल से वाहन के प्रदर्शन पर कोई महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा.
इंजन की सुरक्षा और जंग लगने से जुड़े दावों की भी तकनीकी जांच की गई.
Government के निर्देश पर 2014 से एआरएआई ने आईओसीएल, आईआईपी और एसआईएएम के साथ मिलकर विस्तृत परीक्षण किए. इन परीक्षणों में ड्राइविंग प्रदर्शन, ठंडे मौसम में स्टार्ट होने की क्षमता तथा धातु और प्लास्टिक के पुर्जों की अनुकूलता का मूल्यांकन किया गया.
रिपोर्ट के अनुसार, इनमें किसी भी तरह की तकनीकी समस्या सामने नहीं आई.
इसी अध्ययन में पर्यावरणीय लाभ भी दर्ज किए गए. दोपहिया वाहनों में कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन लगभग 50 प्रतिशत और चारपहिया वाहनों में करीब 30 प्रतिशत तक कम पाया गया. वहीं, बिना जले हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन भी लगभग 20 प्रतिशत घटा.
कुछ social media पोस्ट में दावा किया गया कि ई20 ईंधन इस्तेमाल करने पर वाहन की बीमा पॉलिसी या कंपनी की वारंटी समाप्त हो सकती है. Government ने इसे पूरी तरह गलत बताया है. उसके अनुसार, बीमा कंपनियों और वाहन निर्माताओं दोनों ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित मानकों वाला ई20 ईंधन इस्तेमाल करने पर न तो बीमा अमान्य होगा और न ही वाहन की वारंटी समाप्त होगी.
एसआईएएम ने भी स्पष्ट किया है कि ई20 पर चलने वाले वाहनों पर वारंटी पूरी तरह लागू रहेगी. प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की फैक्ट चेक यूनिट ने भी ऐसे दावों को गलत बताया है.
हाल के दिनों में social media पर ऐसे वीडियो भी वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि एथेनॉल में चीनी होने के कारण वाहन के फ्यूल कैप पर चींटियां और मधुमक्खियां जमा हो जाती हैं.
India पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने इन दावों को खारिज करते हुए बताया कि ईंधन ग्रेड एथेनॉल को किण्वन और आसवन की प्रक्रिया से तैयार किया जाता है, जिसमें बची हुई शर्करा पूरी तरह समाप्त हो जाती है.
इसके अलावा एथेनॉल में ऐसे डिनैचुरेंट्स मिलाए जाते हैं, जो कीड़ों को दूर रखते हैं. पेट्रोल में मिलाने के बाद उसकी हाइड्रोकार्बन गंध ही प्रमुख रहती है, इसलिए कीट आकर्षित होने का कोई कारण नहीं होता.
कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि Government ने Supreme Court में ई20 कार्यक्रम को एक “प्रयोग” बताया था. इस पर India के अटॉर्नी जनरल कार्यालय ने स्पष्ट किया कि अदालत में मामला केवल एथेनॉल संयंत्रों से तेल विपणन कंपनियों द्वारा खरीद से जुड़े अनुबंधों और आवंटन व्यवस्था से संबंधित था.
कार्यालय ने स्पष्ट किया कि अदालत में कहीं भी ई20 कार्यक्रम को “प्रयोग” नहीं बताया गया था और मीडिया से न्यायिक कार्यवाही की सही रिपोर्टिंग करने की अपील की गई.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस दावे को भी गलत बताया कि ई20 ईंधन वाहन के फ्यूल टैंक में पानी पहुंचने देता है.
मंत्रालय के अनुसार, पानी का फ्यूल टैंक में पहुंचना किसी भी प्रकार के ईंधन के लिए नुकसानदायक है, लेकिन आधुनिक वाहनों में ऐसे सुरक्षा उपाय मौजूद हैं जो इस तरह की समस्या को रोकते हैं.
social media पर कुछ वीडियो में यह भी दिखाया गया कि गन्ने का रस सीधे पेट्रोल में मिलाया जा रहा है या एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल अलग-अलग परतों में बंट जाता है.
Government ने इन वीडियो को फर्जी और भ्रामक करार दिया है.
एथेनॉल संयंत्रों पर भू-जल दोहन, प्रदूषण और खेती को नुकसान पहुंचाने के आरोपों पर भी Government ने जवाब दिया है.
Government का कहना है कि आधुनिक एथेनॉल संयंत्र कड़े पर्यावरणीय मानकों के तहत संचालित होते हैं और इनके संचालन पर लगातार निगरानी रखी जाती है.
Government के अनुसार, एथेनॉल सप्लाई वर्ष 2014-15 से मई 2026 तक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम के कई सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस कार्यक्रम से 1.90 लाख करोड़ रुपए से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है. किसानों को 1.60 लाख करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है. इसके अलावा, 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आई है और 310 लाख मीट्रिक टन से अधिक कच्चे तेल के आयात का विकल्प तैयार हुआ है.
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डीबीपी