
New Delhi, 17 अगस्त . India की आजादी की कहानी सिर्फ सत्याग्रह, अहिंसा और आंदोलनों से नहीं जुड़ी है. यह उसकी कहानी भी है, जिसने एक युवा को ब्रिटिश हुकूमत की सबसे प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम की अग्निपथ पर ला खड़ा किया. साहस की यह वही कहानी है, जिसने नजरबंदी की दीवारों को तोड़ा, हजारों किलोमीटर का जोखिम भरा सफर तय किया और दुनिया के युद्धरत शक्तिशाली देशों के बीच India की आजादी के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की.
सुभाष चंद्र बोस यानी नेताजी इसी अदम्य संकल्प का नाम हैं. 18 अगस्त 1945 में उनके विमान हादसे में निधन की खबर आई, लेकिन इस पर सवाल उठते रहे. आज भी यह नहीं पता है कि इस तारीख को आखिर हुआ क्या था. यही रहस्य आज भी उनकी कहानी को इतिहास के सबसे चर्चित अध्यायों में बनाए हुए है.
सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक, Odisha में हुआ था. उनके पिता जानकीनाथ बोस कटक के प्रतिष्ठित वकील थे और उन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि मिली थी. बाद में वे बंगाल विधान परिषद के सदस्य भी बने. मां प्रभावती देवी थीं. पढ़ाई में वह बेहद प्रतिभाशाली और अनुशासित छात्र थे. उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से दर्शनशास्त्र में बीए किया. विद्यार्थी जीवन में ही स्वामी विवेकानंद के विचारों का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे.
ब्रिटिश शासन और भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव ने उनके भीतर विद्रोह की भावना पैदा की. 1916 में ब्रिटिश प्रोफेसर ईएफ ओटन की भारतीय छात्रों पर कथित नस्लीय टिप्पणी के बाद बोस के साथ हुई झड़प ने उन्हें ब्रिटिश विरोधी युवा के रूप में चर्चित कर दिया. इसके बाद उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया. उनके पिता चाहते थे कि सुभाष सिविल सर्वेंट बनें. वे इंग्लैंड गए और भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में शामिल हुए. उन्होंने परीक्षा में चौथा स्थान हासिल किया और अंग्रेजी में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए. लेकिन Governmentी सेवा और देश की आजादी के बीच उन्होंने आजादी को चुना. अप्रैल 1921 में उन्होंने आईसीएस से इस्तीफा दे दिया और India लौट आए.
India आने के बाद वे कांग्रेस से जुड़े और जल्द ही युवा राजनीति में एक प्रभावशाली चेहरा बन गए. 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स के India दौरे के विरोध में आंदोलन करने पर उन्हें गिरफ्तार भी किया गया. सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के भीतर तेजी से उभरे. वे पूर्ण स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे और ब्रिटिश शासन के खिलाफ अधिक आक्रामक रणनीति चाहते थे. 1938 और 1939 में, वे कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए. हालांकि, महात्मा गांधी और कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ रणनीति और अहिंसा के सवाल पर उनके मतभेद बढ़ते गए. अंततः उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.
द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद बोस ने ब्रिटेन की मदद के लिए भारतीय संसाधनों और सैनिकों के इस्तेमाल का विरोध किया. सितंबर 1939 में युद्ध शुरू हुआ और ब्रिटिश Government ने भारतीय नेताओं से सलाह किए बिना India को युद्धरत पक्ष घोषित कर दिया. कांग्रेस के सात प्रांतों की Governmentों ने इसके विरोध में इस्तीफा दे दिया. बोस ने युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन आंदोलन तेज किया. उन्हें गिरफ्तार किया गया. भूख हड़ताल के बाद तबीयत बिगड़ने पर उन्हें जेल से छोड़ा गया, लेकिन घर में नजरबंद कर दिया गया.
1941 में बोस ब्रिटिश निगरानी से रहस्यमय ढंग से निकल गए. वे काबुल पहुंचे और फिर यूरोप की ओर गए. नवंबर 1941 में जर्मन रेडियो से उनकी आवाज भारतीयों तक पहुंची. इससे India में उनके समर्थकों और क्रांतिकारियों के बीच नया उत्साह पैदा हुआ. बोस ने ब्रिटेन के खिलाफ द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी और जापान जैसी धुरी शक्तियों से सहयोग लेने की रणनीति अपनाई. 1943 में उन्होंने बेहद जोखिम भरी यात्रा करते हुए जर्मनी से पूर्वी एशिया का रुख किया. समुद्र के भीतर पनडुब्बियों और खतरनाक समुद्री रास्तों से गुजरकर वे जापान पहुंचे.
पूर्वी एशिया पहुंचकर नेताजी ने इंडियन नेशनल आर्मी यानी आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला. इस सेना की शुरुआत 1942 में रास बिहारी बोस के प्रयासों से हुई थी. बाद में सुभाष चंद्र बोस को इसका नेतृत्व सौंपा गया. 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद Government की घोषणा हुई. अंडमान और निकोबार द्वीपों को ब्रिटिश नियंत्रण से अलग कर उनके नाम क्रमशः ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ रखे गए. आजाद हिंद फौज में सुभाष ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड और गांधी ब्रिगेड जैसी इकाइयां बनाई गईं.
बोस का लक्ष्य पूर्वी मोर्चे से India में प्रवेश कर अंग्रेजों को बाहर करना था. आईएनए ने जापानी सेना के साथ बर्मा के रास्ते India की सीमा तक मार्च किया. सैनिकों का युद्धघोष था- ‘दिल्ली चलो.’ India की धरती पर पहुंचने का वह क्षण सैनिकों के लिए भावुक था. वे मिट्टी को माथे से लगाने और चूमने लगे. लेकिन युद्ध का रुख जल्द बदल गया. हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया और आजाद हिंद फौज का अभियान भी थम गया.
अगस्त 1945 में ताइवान में एक विमान हादसे में नेताजी की मृत्यु होने की खबर सामने आई. लेकिन, इस पर आज भी सवाल उठ रहे हैं. इसके बाद उनके जीवित रहने और अलग-अलग स्थानों पर रहने को लेकर कई सिद्धांत सामने आए. India Government ने उनकी मृत्यु की परिस्थितियों की जांच के लिए समितियां गठित कीं. मई 1956 में शाहनवाज समिति ने जापान जाकर मामले की जांच की. ताइवान के साथ Political संबंध न होने के कारण उस समय केंद्र Government ने वहां की Government से सहायता नहीं ली.
बाद में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट 17 मई 2006 को संसद में रखी गई. रिपोर्ट में कहा गया कि बोस की विमान दुर्घटना में मृत्यु नहीं हुई थी और रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां उनकी नहीं थीं. हालांकि, India Government ने आयोग के निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया.
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पीएसके/एबीएम