Supreme Court ने नाबालिग को गर्भपात की अनुमति दी, कहा- महिला को मजबूर नहीं किया जा सकता

New Delhi, 24 अप्रैल . Supreme Court ने Friday को एक महत्वपूर्ण फैसले में 15 साल की नाबालिग बच्ची को गर्भपात की अनुमति दी. कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला को अनचाही गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे को जन्म के बाद गोद देने के विकल्प के आधार पर महिला से गर्भपात का अधिकार नहीं छीना जा सकता.

Supreme Court ने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए याचिकाकर्ता को राहत दी. कोर्ट ने दिल्ली एम्स को यह निर्देश दिया है कि सभी जरूरी मेडिकल सुरक्षा उपायों के साथ जल्द से जल्द गर्भपात की प्रक्रिया पूरी की जाए.

सुनवाई के दौरान केंद्र Government की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गर्भपात की मांग का विरोध किया. उन्होंने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार गर्भावस्था 7 महीने की उन्नत अवस्था (एडवांस्ड स्टेज) में है और इस समय गर्भपात कराने से मां की जान को खतरा हो सकता है. तुषार मेहता ने यह भी सुझाव दिया कि सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स ऑथोरिटी के जरिए बच्चे को गोद दिया जा सकता है. उन्होंने परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए आर्थिक मदद देने का प्रस्ताव भी रखा.

हालांकि, सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने यह स्पष्ट कहा कि यदि गर्भवती महिला को जबरन गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो भविष्य में लोग कोर्ट आने से बचेंगे और दूसरे तरीके अपना सकते हैं.

इससे पहले, 6 फरवरी को भी एक अहम सुनवाई में Supreme Court ने यह स्पष्ट किया था कि कोई भी अदालत किसी महिला को, खासकर नाबालिग को, उसकी मर्जी के बिना गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती. यह टिप्पणी उस मामले में आई है, जिसमें अदालत ने 30 हफ्ते की गर्भवती को गर्भपात की इजाजत दी. जानकारी के अनुसार, लड़की जब 17 साल की थी, तब वह एक संबंध में गर्भवती हो गई थी. Supreme Court ने कहा कि पहली नजर में यह प्रेग्नेंसी अवैध लग सकती है, क्योंकि उस समय लड़की बालिग नहीं थी. हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया था कि इस मामले में यह जरूरी नहीं है कि वह संबंध लड़की की मर्जी का था या यौन शोषण का मामला था. अदालत ने यह भी कहा था कि प्रजनन से जुड़े मामलों में महिला का निर्णय सबसे अहम माना जाना चाहिए.

सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया था कि आखिर अजन्मे बच्चे और उसे जन्म देने वाली महिला में किसके अधिकार को प्राथमिकता दी जाए. अदालत ने स्पष्ट किया कि लड़की की मर्जी के बिना उसे अपनी गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. इस मामले में कोर्ट ने Mumbai के जेजे अस्पताल को निर्देश दिया कि वह सभी जरूरी सावधानियों और एहतियातों के साथ लड़की की प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करे. साथ ही, अस्पताल यह भी सुनिश्चित करे कि प्रक्रिया सुरक्षित तरीके से हो और लड़की को किसी तरह की मानसिक या शारीरिक हानि न पहुंचे.

पीएसके

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