फिल्मी गानों में सिमटता सूफीवाद, मुज्तबा नजा ने बयां किया कव्वाली का बदलता दौर

Mumbai , 24 अप्रैल . भारतीय संगीत जगत में अपनी बुलंद और रूहानी आवाज से पहचाने जाने वाले मशहूर प्लेबैक सिंगर मुज्तबा अजीज नजा एक प्रतिष्ठित संगीत घराने से ताल्लुक रखते हैं. गायक ने के साथ खास बातचीत में सूफी संगीत की बदलती स्थिति पर बात की.

उन्होंने के साथ बातचीत में सूफी संगीत के सिमटते दायरे पर बात की. उन्होंने इस बात पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज की फिल्मों में सूफी संगीत केवल ‘इमोशनल सीन’ या किसी खास हालात तक सीमित होकर रह गया है. एक दौर था जब हर फिल्म में एक कव्वाली अनिवार्य होती थी. आज वह समय बदल गया है. अब कव्वाली और सूफी गानों का इस्तेमाल केवल कहानी की मांग के हिसाब से ही किया जाता है. सूफी संगीत की आत्मा उसकी गहराई में है, जिसे आज के फास्ट फॉरवर्ड डिजिटल जमाने में बचाकर रखना थोड़ा मुश्किल होता जा रहा है. लोग अब गानों को सुनने के बजाय ‘स्क्रॉल’ करते हैं, जबकि सूफी संगीत सब्र और सुकून की मांग करता है.

गायक ने लाइव परफॉर्मेंस के बारे में करते हुए बताया कि कव्वाली पूरी तरह से माहौल और दर्शकों की ऊर्जा पर निर्भर करती है. उन्होंने कहा, “हम गानों की लिस्ट तो बनाकर ले जाते हैं, लेकिन जैसे ही मंच पर पहुंचते हैं, दर्शकों का उत्साह सब कुछ बदल देता है. हम मौके पर ही गानों के अंदाज और क्रम को बदल देते हैं. यही सहजता कव्वाली की असली ताकत है.”

उन्होंने स्वीकार करते हुए कहा कि जब आपके नाम के साथ कोई बड़ा व्यक्तित्व जुड़ा हुआ होता है, तो सभी की उम्मीदें आपसे दोगुना हो जाती है. शुरुआत में मुझे उस जिम्मेदारी का अंदाजा नहीं था, शायद इसलिए राह थोड़ी आसान लगी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, मुझे समझ आया कि असली चुनौती उन उम्मीदों पर खरा उतरने और अपनी खुद की पहचान बनाने में है. मैंने इन चुनौतियों को स्वीकार किया और अपनी कला को निखारने पर काम किया. ऊपर वाले के शुक्र से मैं आज इस मुकाम पर हूं.

गायक मुज्तबा अजीज नजा, फिल्ममेकर संजय लीला भंसाली की ‘बाजीराव मस्तानी’ और ‘पद्मावत’ जैसी बड़ी फिल्मों में अपनी गायकी का लोहा मनवा चुके हैं. उन्होंने संजय लीला के साथ अपने काम करने को एक ‘लाइफ-चेंजिंग’ अनुभव बताया.

उन्होंने कहा, “संजय सर, एक परफेक्शनिस्ट हैं. वे अपनी कला के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसा प्रोजेक्ट मेरे लिए महज एक फिल्म नहीं, बल्कि सीखने की एक पाठशाला थी. भले ही मैं मुख्य कलाकार के तौर पर नहीं था, लेकिन उस संगीत का हिस्सा होना ही गौरव की बात थी. उनके साथ कोई रचनात्मक मतभेद कभी नहीं हुआ क्योंकि उनका विजन कलाकार को अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित करना है. कई बार कंपोजीशन इतनी तेजी से तैयार हुए कि वह पल खुद में जादुई बन गए.”

एनएस/एबीएम

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