
रायपुर, 19 अगस्त . छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में पत्नी की याचिका खारिज करते हुए कहा है कि शादी होने से एक नया परिवार जरूर बनता है, लेकिन बुजुर्ग और बीमार माता-पिता के प्रति संतान की नैतिक व कानूनी जिम्मेदारियों को खत्म नहीं करता. यदि कोई पत्नी बिना किसी ठोस और वाजिब वजह के बीमार सास-ससुर को बेसहारा छोड़कर अलग रहने का दबाव बनाती है, तो यह आचरण पति के प्रति मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है.
हाईकोर्ट के जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने फैमिली कोर्ट द्वारा मंजूर किए गए तलाक के आदेश को सही ठहराया है.
राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ निवासी सिख युवक का विवाह 8 मार्च 2007 को पत्थलगांव निवासी महिला के साथ हुआ था. शादी के करीब डेढ़ वर्ष बाद से ही दोनों के बीच पारिवारिक विवाद शुरू हो गया.
पति का आरोप था कि उसके पिता की तीन बार हार्ट सर्जरी हो चुकी है, इसके बावजूद पत्नी लगातार उस पर माता-पिता को छोड़कर अलग रहने का दबाव बनाती रही. मना करने पर वह सास-ससुर से दुर्व्यवहार करती थी. वर्ष 2018 में दोनों पक्षों के रिश्तेदारों के बीच हुई सामाजिक सुलह में पत्नी ने लिखित माफीनामा भी दिया था, लेकिन इसके बाद भी उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया.
पति ने तंग आकर डोंगरगढ़ फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी. फैमिली कोर्ट ने 11 नवंबर 2024 को क्रूरता के आधार पर पति के पक्ष में तलाक का फैसला सुनाया, जिसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की थी. मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी ने आरोप लगाया कि सास के उकसाने पर पति उसे प्रताड़ित करता था और पेट्रोल पंप खोलने के नाम पर मायके से 50 लाख रुपए की मांग की गई थी. साथ ही उसने माफीनामे पर जबरन हस्ताक्षर कराने की बात कही.
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों और बयानों की पड़ताल के बाद पत्नी के इन आरोपों को पूरी तरह निराधार पाया. हाईकोर्ट ने Supreme Court की नजीर का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू समाज में माता-पिता की सेवा और भरण-पोषण करना बेटे का दायित्व है. पति द्वारा अपने बीमार पिता की देखभाल के लिए अलग रहने से मना करना पूरी तरह उचित और स्वाभाविक है. पत्नी द्वारा अलग रहने के लिए बनाया जा रहा लगातार दबाव मानसिक प्रताड़ना है.
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डीके/एबीएम