
New Delhi, 28 अप्रैल . आज के समय में अगर सबसे बड़ी चिंता किसी चीज को लेकर है, तो वह है बच्चों का बढ़ता हुआ स्क्रीन टाइम. मोबाइल, टीवी और टैबलेट अब बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं. सुबह उठने से लेकर रात सोने तक, कई बच्चे घंटों तक स्क्रीन से चिपके रहते हैं.
कई मां-बाप को लगता है कि अगर वे अपने बच्चे को मोबाइल या टीवी देखने देंगे तो वह शांति से एक जगह बैठा रहेगा और ज्यादा मौज-मस्ती करके तंग नहीं करेगा, लेकिन आपकी ये सहूलियत बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में बाधा बन सकती है.
टेक्नोलॉजी ने हमारी जिंदगी को आसान जरूर बनाया है, लेकिन इसका ज्यादा इस्तेमाल धीरे-धीरे आदत और फिर लत में तब्दील हो रहा है. इसका असर बच्चों पर भी पड़ रहा है. बच्चे अब आउटडोर गेम्स से दूर होते जा रहे हैं. पहले जहां बच्चे गली में क्रिकेट, खो-खो या साइकिलिंग करते थे, वहीं अब उनका ज्यादा समय वीडियो गेम्स, कार्टून और social media पर गुजरता है.
इस बदलाव का असर उनकी सेहत पर साफ दिखने लगा है. कम शारीरिक गतिविधि के कारण बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है. कई बच्चे जल्दी थकने लगते हैं, उनका फिजिकल स्टैमिना कम हो रही है और आंखों से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ रही हैं. डॉक्टर भी मानते हैं कि ज्यादा स्क्रीन देखने से नींद की गुणवत्ता पर असर पड़ता है, जिससे बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है.
सिर्फ शरीर ही नहीं, दिमागी विकास पर भी इसका असर पड़ता है. लगातार स्क्रीन पर रहने से बच्चों का ध्यान कम समय तक टिक पाता है. पढ़ाई में मन कम लगना, जल्दी चिड़चिड़ापन और सोशल इंटरैक्शन में कमी जैसी समस्याएं भी देखने को मिल रही हैं. कई बच्चे असल दुनिया की बजाय वर्चुअल दुनिया में ज्यादा जीने लगते हैं, जो लंबे समय में उनके व्यक्तित्व को प्रभावित कर सकता है.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि टेक्नोलॉजी पूरी तरह नुकसानदायक है. आज की पढ़ाई और जानकारी के लिए मोबाइल और इंटरनेट जरूरी हैं. ऑनलाइन क्लासेज, एजुकेशनल वीडियो और डिजिटल लर्निंग ने बच्चों को नए अवसर दिए हैं. लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इसका इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा हो जाता है और बैलेंस बिगड़ जाता है.
माता-पिता की भूमिका यहां बहुत अहम हो जाती है. बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करना, उन्हें आउटडोर गेम्स के लिए प्रेरित करना और फैमिली टाइम बढ़ाना जरूरी है. छोटे-छोटे बदलाव जैसे रोज कुछ समय पार्क में खेलना, किताबें पढ़ना या कोई क्रिएटिव एक्टिविटी करना बच्चों के विकास में बड़ा फर्क ला सकता है.
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पीआईएम/एएस