
New Delhi, 8 अप्रैल . ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल की जारी जंग में एक बड़ा मोड़ तब आया जब दोनों गुटों के बीच सीजफायर की बात पर सहमति बन गई. हालांकि इस युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में परेशानी जारी थी, खासकर कच्चे तेल और रसोई गैस की किल्लत से दुनिया के कई देश त्राहिमाम कर रहे थे. लेकिन इस सीजफायर के दौरान अमेरिका ने जिस देश को आगे रखा, उसके बारे में तो दुनिया का कोई भी देश मानने को तैयार नहीं था कि मध्यस्थता उसने करवाई होगी.
चीन के हथियार और कर्ज पर पल रहा Pakistan अब अमेरिका की कृपा और भरोसा पाने के लिए पर्दे के पीछे छुपकर चीन और अमेरिका की चापलूसी करने वाला अचानक अमेरिका के बयान के बाद शांति का मसीहा बनकर अपनी पीठ थपथपाने लगा.
दरअसल, ईरान के साथ इजरायल और अमेरिका की जंग के बीच सीजफायर के ऐलान के साथ अमेरिकी President डोनाल्ड ट्रंप ने शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर का नाम लेकर Pakistan को युद्धविराम का श्रेय दिया. इसे Pakistan अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर देखने लगा, और इस खुशी का जश्न अभी परवान भी नहीं चढ़ा था कि पूरी दुनिया को पता चल गया कि चीन ने कैसे पर्दे के पीछे से Pakistan के कंधे पर रखकर सीजफायर वाली बंदूक अमेरिका और ईरान के सामने तान रखी थी और दोनों को इसे मानने पर मजबूर होना पड़ा.
अब जरा पूरे प्रकरण में पीठ थपथपाते Pakistan की लाचारगी देखिए. खुद अफगानिस्तान से मात खा रहा Pakistan चीन के भरोसे अपने खिलाफ जारी तालिबानी आक्रमण को रोकने की जुगत लगा रहा है. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान India ने जब Pakistan के 12 में से ज्यादातर बड़े एयरबेस पर हमला कर काम के लायक नहीं छोड़ा, तो वह चीन और अमेरिका के पैरों में गिरकर सीजफायर के लिए India को तैयार कराने की बात कर रहा था. वह अब दुनिया में शांति का मसीहा बन रहा है. Pakistan की यह पोल उसके ही दो ऐसे देशों ने खोल दी थी, जिनमें अमेरिका और चीन दोनों शामिल थे.
अमेरिका ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर Pakistan और India के बीच सीजफायर नहीं होता तो Pakistan में इतनी तबाही मचती कि वह उसको झेल नहीं पाता और Pakistan के पीएम तक मारे जा सकते थे. वहीं अमेरिका के दावे के कुछ दिन बाद Pakistan के दूसरे आका चीन ने भी माना की Pakistan के कहने पर उसने India से बातचीत कर Pakistan और India के बीच सीजफायर कराई.
तब Pakistan के परमाणु कार्यक्रम की जानकारी रखने वाले अमेरिका के एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने एक अखबार के साथ बातचीत में इस बात का दावा किया था कि “Pakistan का सबसे बड़ा डर उसके परमाणु कमान प्राधिकरण के सिर काटे जाने का है. नूर खान पर India के मिसाइल हमले को इसी तरह से देखा जा सकता है कि वह ऐसा कर सकता है.”
मतलब साफ था कि भारतीय सेना ने Pakistan के आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने के साथ वहां के सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया था. अपने परमाणु ठिकानों की सुरक्षा की चिंता के कारण ही Pakistan को India के सामने घुटने टेकने पड़े.
वैसे Pakistan के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर चिंता में तो पूरी दुनिया है. क्योंकि आतंकियों को पनाह देने के इतिहास के चलते पूरी दुनिया के लिए यह चिंता का विषय है कि पाक के परमाणु हथियार किसी गलत हाथों में ना चले जाएं.
वैसे India और पाक के बीच सीजफायर में अमेरिका की दिलचस्पी की वजह पाक के सैन्य अड्डे, एयरबेस व परमाणु हथियार रहे हैं. अमेरिका पहले कई बार पाक के सैन्य अड्डों व एयरबेस को इस्तेमाल करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन Pakistan, अफगानिस्तान, चीन जैसे देशों के दबाव के चलते अमेरिका को ऐसा करने देने से बचता रहा है. अमेरिका को यही सही मौका दिखा जब India के हाथों पाक की जबरदस्त धुनाई हो रही थी, तो वह मसीहा बनकर सामने आया और Pakistan को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहा कि वह India से बातचीत कर उसे बचा सकता है. हालांकि चीन को Pakistan की यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी, क्योंकि Pakistan को India के खिलाफ युद्ध में इस्तेमाल करने के लिए अपने हथियार से लेकर ड्रोन तक चीन मुहैया करा रहा था. हालांकि इसमें भी चीन का ही फायदा था, क्योंकि चीन ने भारत-पाक के बीच जारी जंग के बीच Pakistan को हथियार मुहैया कराकर अपने लिए टेस्टिंग ग्राउंड तैयार किया था. और India की जवाबी कार्रवाई में चीन के सारे हथियार और ड्रोन टांय-टांय फुस्स साबित हुए थे.
दूसरी तरफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान India ने हवाई हमले में Pakistan के कई लड़ाकू विमान भी नष्ट कर दिए थे. जिसको लेकर Pakistan दावा करता रहा था कि वह दुनिया के सबसे भरोसेमंद और बेहतरीन लड़ाकू विमान हैं. यानी कुल मिलाकर India ने Pakistan को पर्दे के पीछे से चीन और अमेरिका की तरफ से दी जा रही मदद की पूरी कलई खोलकर रख दी थी. Pakistan के President आसिफ अली जरदारी ने तो यहां तक कबूल कर लिया था कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय सेना का शौर्य देखकर Pakistan के बड़े नेताओं की भी हालत इतनी पतली हो चुकी थी कि वो खुद को बचाने के लिए बंकरों में छिपने तक की सोच रहे थे.
इस जंग में चीन के हथियारों की ऐसी भद्द पिटी कि Pakistan को चीन से ज्यादा अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर भरोसा हो आया. चीन अपने जिन हथियारों को सस्ता और अचूक बताकर दुनिया भर में ढोल पीटता रहा था, वे दुनिया भर में हुए हाल के संघर्षों में बुरी तरह फेल हुए हैं. पहले ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान India ने चीनी रक्षा कवच का कबाड़ा बनाया, फिर वेनेजुएला में अमेरिकी ऑपरेशन के दौरान चीनी ढाल बेकार साबित हुई. अब ईरान पर अमेरिका और इजरायली हमलों में बीजिंग के सिस्टम का गुब्बारा बुरी तरह फूट गया था. इससे साबित हो चुका था कि चीन, जिसे अचूक हथियार होने का दावा कर रहा है, वह घटिया इंजीनियरिंग, कमजोर सॉफ्टवेयर के दम पर बना है, जो कबाड़ से ज्यादा कुछ नहीं है. ऐसे में चीन के लिए भी इस युद्ध में शर्मिंदगी साफ झलक रही थी और उसके लिए जरूरी था कि इस युद्ध को जल्द से जल्द रोका जाए. चीन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है और उसे पता है कि यही हालत रही तो उसके हथियार बाजार में भरोसे के संकट से जूझते रहेंगे.
Pakistan की दुविधा देखिए, पहले वहां की Government भारत-पाक के बीच सीजफायर के लिए ट्रंप के दावे के साथ खड़ी हुई और जब दूसरे आका ने दबाव डाला, तो Pakistan की Government ने दावा किया कि चीन ने भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को रोकने में मध्यस्थता की थी. यानी India के खिलाफ जंग में जो देश अपनी सुरक्षा की चिंता लेकर अमेरिका और चीन के सामने घुटने टेक रहा था, वह दावा कर रहा है कि उसने ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर के लिए मध्यस्थता की.
Pakistan पूरी दुनिया को यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए इस युद्ध में मध्यस्थता कर रहा था, लेकिन सबको पता है कि ईरान के साथ Pakistan की 900 किलोमीटर लंबी सीमा है. ईरान जितना अस्थिर हो रहा था Pakistan की स्थिति उतनी खराब हो रही थी. एक तरफ अफगानिस्तान की सीमा पर Pakistan की हालत खराब थी, दूसरी तरफ ईरान की सीमा पर Pakistan की हालत पतली होती जा रही थी. मतलब Pakistan की ये सक्रियता शांति स्थापित करने के लिए तो कतई नहीं थी, बल्कि ये तो डॉलर वाली एक डील थी. Pakistan का लालच, सौदेबाजी और निजी हितों का मिश्रण इसकी बड़ी वजह रही.
अमेरिका की कृपा पर पलने वाली Pakistanी सेना और Government के लिए यह सुनहरा मौका था, क्योंकि चीन तो Pakistan को दिए गए कर्ज की वसूली के लिए कई महीनों से धमकी दे रहा था. ऐसे में Pakistan ने अमेरिका को खुश करके अपनी झोली में कुछ भीख इकट्ठा करने के जुगाड़ कर लिए और दूसरी तरफ चीन के लिए जो पर्दे के पीछे खड़े होकर सारा खेल खेल रहा था, उसके सामने ढाल बनकर उसको भी कुछ दिनों के लिए भरोसे में ले लिया ताकि ड्रैगन उससे कर्ज की रकम की उगाही की बात भूल जाए. साथ ही आतंकी मुल्क Pakistan दुनिया में अपनी छवि सुधारने की भरसक कोशिश में लगा है और उसे इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता था.
यानी फर्जी दावे करने वाला Pakistan रातोंरात ईरान-अमेरिका के ‘महायुद्ध’ में सीजफायर कराने वाला ‘चौधरी’ बनने लगा. जबकि चीन ईरान, अमेरिका युद्ध से अब प्रभावित होने लगा था. उसे मुख्य रूप से तेल आपूर्ति ईरान से ही होती है, जो बाधित हो गई थी. कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और वैश्विक मांग में कमी के कारण चीन अब आर्थिक दबाव झेल रहा था. उसने इसके लिए Pakistan को आगे किया और अपनी नाकामी छुपाने के लिए Pakistan भी तैयार हो गया क्योंकि उसे लगातार ईरान से फटकार मिल रही थी.
दूसरी तरफ इस जंग के बीच चीन ने भी पाक को लेकर अपना तेवर बदल लिया था और दोस्ती के बीच लक्ष्मण रेखा खींचते हुए बिजली का बकाया बिल Pakistan से मांग लिया था. जो लगभग 220 मिलियन डॉलर (लगभग 2,050 करोड़ रुपए) के करीब है. इसे न चुकाने पर चीन ने Pakistan को गंभीर परिणाम भुगतने और विदेशी निवेश ठप होने की सीधी धमकी भी दे डाली थी. इस सबके बीच संयुक्त अरब अमीरात ने भी Pakistan को दिए लोन का पैसा वापस मांग लिया था. यानी एक तो महंगाई से त्राहिमाम कर रहा Pakistan और ऊपर से खैरात समझकर लिए कर्ज की वापसी Pakistanी Government की रातों की नींद उड़ा चुका था. अब Pakistan के पास अपने दोनों आका को खुश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था.
अमेरिका को भी इस युद्ध में बड़ा नुकसान हुआ और दूसरी तरफ ट्रंप का विरोध उसके देश में ही जमकर होने लगा. ऐसे में इस युद्ध से सम्मानजनक रूप से निकलने के लिए अमेरिका ने ढुलमुल Pakistan को बिचौलिया बनाया. Pakistan को भी पता है कि उसे अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए चीन की मदद चाहिए और अपनी दयनीय हालत सुधारने के लिए अमेरिका की, इसलिए वह दोनों खेमों में जाकर घुटनों के बल बैठ गया. इसके साथ ही Pakistan अफगानिस्तान के साथ अपना समझौता कराने के लिए 5 देशों चीन, तुर्की, यूएई, सऊदी अरब और कतर के साथ टेबल पर है. चीन इस शांति वार्ता को लीड कर रहा है, जिसके बदले में Pakistan ने उसे अपना कंधा यहां इस्तेमाल करने के लिए दिया था.
मतलब साफ है कि चीन के हथियार और कर्ज के साथ अमेरिका की कृपा और भरोसा दोनों Pakistan को भा गया.
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जीकेटी/