अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस : सम्मान, समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन का संदेश

New Delhi, 22 जून . विवाह के बाद हर दंपति अपने जीवन को खुशहाल और सुरक्षित बनाने के सपने देखता है. हालांकि जीवन हमेशा योजनाओं के अनुरूप नहीं चलता. बीमारी, दुर्घटना या किसी अन्य अप्रत्याशित कारण से जब किसी महिला के जीवनसाथी का निधन हो जाता है, तो उसे भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर कई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे समय में परिवार, समाज और व्यवस्था का सहयोग उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. इसी जरूरत को रेखांकित करने और विधवा महिलाओं के अधिकारों, सम्मान और सशक्तीकरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष 23 जून को अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस मनाया जाता है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2011 में 23 जून को अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी. इसका उद्देश्य दुनिया भर में विधवा महिलाओं के सामने मौजूद चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करना और उनके लिए समान अवसर, सामाजिक सुरक्षा तथा सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के प्रयासों को बढ़ावा देना है. इस दिशा में कई अंतरराष्ट्रीय और सामाजिक संगठन भी लंबे समय से कार्य कर रहे हैं. ब्रिटेन के लूबा फाउंडेशन समेत विभिन्न संस्थाएं विधवा महिलाओं के अधिकारों और उनके साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दों को वैश्विक स्तर पर उठाती रही हैं.

दुनियाभर में करोड़ों महिलाएं विधवा के रूप में जीवन जी रही हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उनकी संख्या 25 करोड़ से अधिक है और इनमें से बड़ी संख्या आर्थिक एवं सामाजिक चुनौतियों का सामना करती है. India और चीन उन देशों में शामिल हैं जहां विधवा महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है. India में भी करोड़ों महिलाएं इस वर्ग का हिस्सा हैं. इनमें बड़ी संख्या आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आती है. वहीं, देश में पूर्व सैनिकों की विधवाओं की संख्या भी लाखों में है, जिनके योगदान और संघर्ष को विशेष रूप से सम्मान देने की आवश्यकता है.

जीवनसाथी के निधन के बाद कई महिलाओं के सामने आय, संपत्ति, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्न खड़े हो जाते हैं. हालांकि पिछले वर्षों में जागरूकता और कानूनी संरक्षण बढ़ा है, फिर भी अनेक महिलाओं को अपने अधिकारों तक पहुंच बनाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. कई स्थानों पर अब भी ऐसी सामाजिक धारणाएं देखने को मिलती हैं, जो उन्हें बराबरी की दृष्टि से देखने में बाधा बनती हैं. गंभीर बात यह है कि किसी शुभ कार्यक्रम में उनकी भूमिका ही खत्म कर दी जाती है.

किसी महिला के विधवा हो जाने के बाद समाज तो छोड़ दीजिए, परिवार में उनको वैसा सम्मान नहीं मिल पाता जिसकी वो हकदार हैं. परिवार और समुदाय की जिम्मेदारी है कि वे उन्हें सहयोग, सुरक्षा और आत्मविश्वास प्रदान करें. साथ ही यह भी जरूरी है कि उनके प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों और नकारात्मक धारणाओं को समाप्त किया जाए. कानून भी सभी नागरिकों को समान अधिकार और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है. अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस इसी संदेश को मजबूत करता है कि विधवा महिलाएं सहानुभूति की नहीं, बल्कि सम्मान, समान अवसर और अधिकारों की हकदार हैं. इसी जागरूकता को फैलाने के लिए हर वर्ष 23 जून को अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस मनाया जाता है.

एसडी/एएस

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