ओस्लो समिट में भारत को “महाशक्ति” बताने पर चर्चा, यूरोप की सोच में बदलाव के संकेत

ओस्लो/New Delhi, 23 मई . हाल ही में नॉर्वे में हुए तीसरे भारत-नॉर्डिक समिट में इस बात पर जोर दिया गया कि 2026 में India एक बड़ी ताकत के तौर पर उभरेगा और यह देश कैसे सक्रिय रूप से गठबंधन बना रहा है और अंतरराष्ट्रीय एजेंडा तय कर रहा है.

एक रिपोर्ट के अनुसार, डेनमार्क की Prime Minister मेटे फ्रेडरिक्सन का India को ‘सबसे बड़ी ताकतों में से एक’ बताना काफी मायने रखता है, क्योंकि यह बयान एक यूरोपीय Government प्रमुख की ओर से आया, जिसे पश्चिमी नीति-निर्माण हलकों में एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि पुरानी वैश्विक श्रेणियां अब लागू नहीं होतीं.”

एक रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में तीसरे इंडिया नॉर्डिक समिट का आयोजन हुआ, जिसमें India और पांच छोटे नॉर्डिक देशों के नेता शामिल हुए. सतह पर यह बैठक जलवायु और तकनीक जैसे साझा एजेंडों पर केंद्रित थी, लेकिन इसके पीछे इससे कहीं अधिक रणनीतिक बदलाव आकार ले रहा था.

रिपोर्ट में कहा गया कि डेनमार्क की Prime Minister ने बैठक के दौरान India की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए उसे मध्य शक्ति नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बताया. यह बयान यूरोपीय देशों के दृष्टिकोण में संभावित बदलाव का प्रतीक माना जा रहा है. यह समिट केवल एक औपचारिक कूटनीतिक बैठक नहीं थी, बल्कि India की बढ़ती वैश्विक कूटनीतिक पहुंच का एक महत्वपूर्ण चरण था.

इस बैठक में भारत-नॉर्डिक संबंधों को “ग्रीन टेक्नोलॉजी और इनोवेशन स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप” के रूप में उन्नत किया गया, जिसे सबसे ठोस उपलब्धि बताया गया.

रिपोर्ट में कहा गया कि यह केवल नाम बदलना नहीं है, बल्कि इसमें स्वच्छ ऊर्जा, व्यापार, निवेश और “ब्लू इकोनॉमी” (समुद्र, शिपिंग और मत्स्य पालन) जैसे क्षेत्रों में संरचित सहयोग शामिल है. विशेषज्ञों के अनुसार, नॉर्डिक देशों की तकनीकी विशेषज्ञता और India की बड़े पैमाने की उत्पादन क्षमता एक-दूसरे की पूरक है, जिससे यह साझेदारी और मजबूत होती है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि India अब केवल सहयोग लेने वाला देश नहीं है, बल्कि वैश्विक नीतियों के निर्माण में सह-लेखक की भूमिका निभा रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उसके बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है.

एक बड़े ग्लोबल प्लेयर के तौर पर India की जगह पर रोशनी डालते हुए, रिपोर्ट में कहा गया, “India ओस्लो में लेक्चर सुनने या मदद पाने नहीं, बल्कि को-ऑथर बनने आया था. यही वह फर्क है जो तीसरे इंडिया-नॉर्डिक समिट ने ग्लोबल मामलों के रिकॉर्ड में दर्ज किया है और यह एक ऐसा फर्क है जो आने वाले सालों में और बढ़ेगा.”

केके/वीसी

Leave a Comment