शिक्षक भर्ती में ट्रांसजेंडर श्रेणी पर Supreme Court सख्त, दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

New Delhi, 20 अक्टूबर . Supreme Court ने शिक्षकों के पदों पर भर्ती विज्ञापनों में ट्रांसजेंडर को शामिल न किए जाने के मामले में दिल्ली Government से जवाब मांगा है. अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि रिक्तियों को पुरुष और महिला उम्मीदवारों के बीच अलग-अलग बांटने का कानूनी आधार क्या है तथा सार्वजनिक रोजगार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को किस तरह समायोजित किया जा सकता है.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने संबंधित पक्षों को 15 दिनों के भीतर अपना हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) द्वारा विज्ञापित रिक्तियों से जुड़े भर्ती नियमों को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं.
जस्टिस पारदीवाला की अध्यक्षता वाली बेंच ने पूछा कि क्या नियमों के तहत पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए शिक्षण पदों का विज्ञापन अलग-अलग निकालना जरूरी है और अगर ऐसा नहीं है तो इस तरह के वर्गीकरण का क्या उद्देश्य है?
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या अधिकारी डीएसएसएसबी के जरिए जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में ‘थर्ड जेंडर’ को शामिल करने का विचार रखते हैं और Governmentी नौकरियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को किस तरह जगह दी जाएगी.
Supreme court , प्रवीण सिंह द्वारा दायर एक हालिया याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें Governmentी नौकरियों तक ट्रांसजेंडर की पहुंच और उम्र में छूट से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं.
इस मामले की कार्यवाही जेन कौशिक द्वारा दायर एक याचिका से शुरू हुई है. इसमें उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के 18 दिसंबर, 2025 के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उन्होंने शिक्षण पदों पर ट्रांसजेंडर के लिए अलग रिक्तियां, न्यूनतम योग्यता और आयु सीमा में छूट तथा Governmentी नियुक्तियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए एक भर्ती नीति की मांग की थी.
इससे पहले एक आदेश में Supreme Court ने कहा था कि हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते समय प्रथम दृष्टया गलती की है. हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को एक सलाहकार समिति के पास जाने का निर्देश दिया था, जबकि उस समिति के पास निर्णय लेने (न्यायिक) शक्तियां नहीं थीं.
Supreme Court ने कौशिक को यह अनुमति भी दी है कि वे भर्ती अधिसूचना में बताए गए लिंग की परवाह किए बिना, ट्रांसजेंडर श्रेणी के तहत रिक्तियों के लिए आवेदन कर सकती हैं. यह राहत दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा उनकी रिट याचिका लंबित रहने के दौरान दी गई थी, जिसे Supreme Court ने भी बरकरार रखा है.
कौशिक ने तर्क दिया था कि डीएसएसएसबी के ऑनलाइन एप्लीकेशन रजिस्ट्रेशन सिस्टम (ओएआरएस) पोर्टल पर रजिस्टर्ड होने के बावजूद, नियुक्ति के चरण में उन्हें बाहर किया जा सकता है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि भर्ती प्रक्रिया में,संबंधित विज्ञापन में बताए अनुसार, केवल पुरुष या महिला उम्मीदवारों पर ही विचार किया जाता है.
Supreme Court ने पहले कहा था कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए कई अन्य मुद्दों का समाधान ‘जेन कौशिक बनाम India संघ’ मामले में दिए गए फैसले में किया जा चुका है. उस मामले में ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019’ और इसके तहत बनाए गए नियमों के लागू होने से जुड़े विषयों पर विचार किया गया था.
सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व न्यायाधीश आशा मेनन की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति का गठन किया था. इसका काम समान अवसर नीति, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए उचित व्यवस्था, शिकायत निवारण तंत्र, लिंग और नाम में बदलाव, समावेशी चिकित्सा देखभाल और जेंडर-विविध व्यक्तियों की सुरक्षा जैसे मुद्दों की जांच करना था.
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एएसएच/वीसी


