
New Delhi, 9 अक्टूबर . Supreme Court ने Rajasthan के एक संविदा दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी को राहत देते हुए उसका मुआवजा 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 7.5 लाख रुपये कर दिया है. कर्मचारी को सेवा से हटाए जाने के खिलाफ करीब 28 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले के विशिष्ट तथ्यों और कर्मचारी द्वारा लंबे समय तक कानूनी उपाय अपनाने को देखते हुए मुआवजे में बढ़ोतरी न्याय के हित में है.
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कल्लू खान की ओर से दायर अपील का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया. खान ने Rajasthan हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी सेवा में बहाली और 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने के बजाय एकमुश्त 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्णय लिया गया था. हाईकोर्ट ने बाद में अपने इस फैसले की समीक्षा करने से भी इनकार कर दिया था.
Supreme Court ने स्पष्ट किया कि मुआवजे में बढ़ोतरी इस मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए की गई है और इसे भविष्य के मामलों में मिसाल नहीं माना जाएगा.
न्यायमूर्ति भुइयां की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता 10 सितंबर 1998 से अपने कानूनी अधिकारों के लिए प्रयास कर रहा था और यह प्रक्रिया 4 अगस्त 2025 के आदेश तक चली. अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि यदि उसे सेवा में बहाल किया जाता, तो वह तीन साल और काम कर सकता था. इन परिस्थितियों को देखते हुए 7.5 लाख रुपये का मुआवजा न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगा.
शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि बढ़ी हुई मुआवजा राशि का भुगतान अपीलकर्ता को एक महीने के भीतर किया जाए.
कल्लू खान ने 19 नवंबर 1990 से 1 सितंबर 1998 तक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में काम किया था. सेवा समाप्त किए जाने के बाद उन्होंने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2ए(2) के तहत उचित मंच पर अपनी सेवा समाप्ति को चुनौती दी.
श्रम न्यायालय ने 18 फरवरी 2020 को अपने फैसले में खान को सेवा में बहाल करने, सेवा की निरंतरता बनाए रखने, पूरा बकाया वेतन देने और अन्य परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया था.
हालांकि, जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से दायर रिट याचिका पर Rajasthan हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 5 मार्च 2021 को श्रम न्यायालय के फैसले में आंशिक बदलाव किया. हाईकोर्ट ने सेवा में बहाली का निर्देश बरकरार रखा, लेकिन बकाया वेतन को 100 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया.
इसके बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 4 अगस्त 2025 को अपने आदेश में सेवा में बहाली, सेवा की निरंतरता और 50 प्रतिशत बकाया वेतन के लाभों को हटाकर उनके स्थान पर 5 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का फैसला सुनाया.
खान ने इस फैसले के खिलाफ Supreme Court में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की. 12 दिसंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, हालांकि उन्हें कानून के तहत उपलब्ध उचित उपाय अपनाने की छूट दी.
इसके बाद खान ने हाईकोर्ट के आदेश की समीक्षा के लिए याचिका दायर की. हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 11 फरवरी 2026 को समीक्षा याचिका खारिज कर दी. इसके बाद उन्होंने दोबारा Supreme Court का रुख किया.
Supreme Court ने कहा कि सेवा में बहाली के स्थान पर मुआवजा देने के हाईकोर्ट के 4 अगस्त 2025 के आदेश को पहले ही शीर्ष अदालत में चुनौती दी जा चुकी थी और उस समय हस्तक्षेप नहीं किया गया था. इसलिए मौजूदा कार्यवाही में उस आदेश की शुद्धता की दोबारा जांच नहीं की जा सकती. हालांकि, पीठ ने माना कि मुआवजे की राशि तय करते समय कर्मचारी की सेवा अवधि, कानूनी उपायों के लिए किए गए लंबे संघर्ष और बहाली होने की स्थिति में तीन साल की अतिरिक्त सेवा की संभावना को ध्यान में रखना उचित है.
अदालत ने दोहराया कि यह आदेश केवल मौजूदा मामले की विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर दिया गया है और इसे अन्य मामलों में मिसाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. जिला शिक्षा अधिकारी को नोटिस की तामील होने के बावजूद उन्होंने अपील का विरोध नहीं किया. इसके बाद 24 सितंबर 2026 को उन्हें मामले में एकतरफा घोषित कर दिया गया.
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डीएससी