
इस्लामाबाद, 11 सितंबर . बलूचिस्तान में Pakistanी सेना द्वारा लोगों को जबरन गायब करने का जो परेशान करने वाला सिलसिला चल रहा है, उसमें ऐतिहासिक रूप से पुरुषों को निशाना बनाया जाता रहा है, जबकि इसके सामाजिक, आर्थिक और मानसिक परिणाम महिलाओं को भुगतने पड़ते हैं.
2025 के बाद से इस चलन में बदलाव आया है और महिलाएं भी अब सीधे तौर पर Governmentी कार्रवाई का शिकार बन रही हैं, जो पूरे प्रांत में Pakistanी अधिकारियों द्वारा दमन के एक व्यापक पहलू की ओर इशारा करता है.
साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (एसएटीपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, “बलूचिस्तान में असहमति के बारे में लोगों की राय बनाने के लिए Government जबरदस्ती जुर्म कबूल करवाने का तरीका अपनाती रही है. महिलाओं को पहले जबरदस्ती गायब कर दिया जाता है, बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के लंबे समय तक हिरासत में रखा जाता है, और उन पर दबाव डालकर या उनके साथ बुरा बर्ताव करके जुर्म कबूल करने के लिए मजबूर किया जाता है. हफ्तों या महीनों तक हिरासत में रखने के बाद उन्हें अचानक सबके सामने लाया जाता है, अक्सर दिखावटी तौर पर या रिकॉर्ड किए गए वीडियो के जरिए, ताकि वे उन कामों को ‘कबूल’ कर सकें जिनसे उन्होंने हमेशा इनकार किया है. महल बलूच का मामला इस पैटर्न के शुरुआती उदाहरणों में से एक था.”
रिपोर्ट में बताया गया है, “फरवरी 2023 में, बिना किसी वारंट के क्वेटा के सैटेलाइट टाउन में महल बलूच के घर पर देर रात की छापेमारी के दौरान सीटीडी ने उन्हें हिरासत में ले लिया. बाद में अधिकारियों ने दावा किया कि उन्हें विस्फोटक के साथ गिरफ्तार किया गया था और उन पर उग्रवादी गतिविधियों से जुड़े होने का आरोप लगाया, जिसमें आत्मघाती हमले में शामिल होना भी शामिल था. उनके परिवार ने इन आरोपों का जोरदार खंडन किया. 55 दिनों तक फिजिकल रिमांड पर रखे जाने के बावजूद अधिकारी उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके. इसके बजाय, बाद में एक वीडियो सामने आया जिसमें वे उग्रवादी गतिविधियों में शामिल होने की बात ‘कबूल’ करती दिखीं. यह बयान Police हिरासत में रहते हुए दिया गया था, न कि अदालत के सामने.”
रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ बलूच महिलाओं के विद्रोही समूहों में शामिल होने, जिसमें Pakistanी सुरक्षा बलों और Governmentी ठिकानों पर महिला फिदायीन (आत्मघाती) हमले भी शामिल हैं, के कारण Government ने जबरदस्ती गायब करने की अपनी पुरानी प्रथा को महिलाओं तक भी बढ़ा दिया है. यह एक ऐसा तरीका है जिसका इस्तेमाल वह दशकों से बलूच पुरुषों के खिलाफ करती रही है.
इसमें यह भी बताया गया है कि भले ही बहुत कम संख्या में बलूच महिलाओं ने विद्रोही हमलों में हिस्सा लिया हो, लेकिन पिछले दशक में बलूचिस्तान की महिलाएं अहिंसक Political सक्रियता में, खासकर जबरदस्ती गायब करने और गैर-न्यायिक हत्याओं के खिलाफ, एक प्रमुख आवाज बनकर उभरी हैं.
उन्होंने लापता रिश्तेदारों के लिए लंबे समय तक विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है और सुरक्षा एजेंसियों पर अपने परिवार के सदस्यों को अगवा करने का आरोप लगाया है.
रिपोर्ट में बताया गया है, “सैकड़ों महिलाओं और परिवार के सदस्यों ने बलूचिस्तान के तुर्बत शहर (केच जिला) से इस्लामाबाद तक लगभग 1,000 मील की लंबी पदयात्रा की और लापता लोगों की वापसी की मांग करते हुए इस्लामाबाद प्रेस क्लब के बाहर धरना दिया, जिससे पूरे देश का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ.”
विरोध आंदोलन में बलूच महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बारे में बताते हुए, बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की नेता सम्मी दीन बलूच ने पिछले साल ‘अरब न्यूज’ को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि पुरुषों के जबरन गायब किए जाने की बढ़ती घटनाओं ने महिलाओं को न्याय की लड़ाई में मुख्य भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया है.
एसएटीपी की रिपोर्ट में सम्मी के हवाले से कहा गया, “हमने देखा कि हमारे पुरुषों, भाइयों और बेटों को सुनियोजित तरीके से उनके घरों और शिक्षण संस्थानों से उठाया गया; रात में सोते समय उन्हें जबरन ले जाया गया. ऐसे हालात में, बलूच महिलाओं के पास यही एकमात्र विकल्प बचा था कि वे इस लड़ाई को खुद अपने हाथों में लें, आगे आएं और न्याय की लड़ाई का नेतृत्व खुद करें.”
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एससीएच/डीकेपी