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Friday, 16 October 2026
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प्रयागराज की सड़कों पर निकला ऐतिहासिक ‘काली स्वांग’ जुलूस, मां के जयकारों से गूंजा दारागंज

प्रयागराज की सड़कों पर निकला ऐतिहासिक ‘काली स्वांग’ जुलूस, मां के जयकारों से गूंजा दारागंज

प्रयागराज, 16 अक्टूबर . उत्तर प्रदेश में नवरात्रि का पर्व अपनी पूरी भव्यता और आध्यात्मिकता के साथ मनाया जा रहा है. शहर के ऐतिहासिक दारागंज इलाके में Thursday रात निकले पारंपरिक ‘काली स्वांग’ जुलूस में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए. देवी काली का रूप धरे कलाकार, हाथों में हथियार और खोपड़ी के पात्र लिए, “जय मां काली” के जयकारों के बीच सड़कों पर नृत्य करते दिखे. यह दृश्य इतना दिव्य और शक्तिशाली था कि देखने वालों के रोंगटे खड़े हो गए.

यह सदियों पुरानी परंपरा रामायण की एक पौराणिक कथा से जुड़ी हुई मानी जाती है और हर साल इसका आयोजन पर्यटकों को भी प्रयागराज की ओर आकर्षित करता है. यह जुलूस केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रयागराज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है.

इस भूमिका को निभाना आसान नहीं है. इसके लिए कलाकारों को महीनों तक कठिन साधना और अनुशासन से गुजरना पड़ता है.

देवी काली का रूप धारण करने वाले कलाकार सचिन शुक्ला ने अपनी तैयारी के बारे में बताया. उन्होंने कहा, “देवी काली की भूमिका निभाने के लिए बहुत कठिन तैयारी करनी पड़ती है. हमें इसके लिए कम से कम दो महीने का समय मिलता है. इस दौरान हमें कड़ी मेहनत करनी होती है. दौड़, शारीरिक व्यायाम और खुद को पूरी तरह फिट रखना पड़ता है, तभी हम इस स्वरूप को सही तरीके से निभा पाते हैं.”

दारागंज रामलीला समिति के अध्यक्ष राजेंद्र कुमार यादव ने इस परंपरा के पीछे की कठोर तपस्या के बारे में जानकारी दी. उन्होंने कहा, “कलाकार पूरे साल इस भूमिका की तैयारी करता है. इसके लिए एक विशेष रिहर्सल तय की जाती है. इस दौरान कलाकार को सख्त खान-पान का पालन करना होता है, नियमित रूप से भजन-कीर्तन करना होता है और ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करना पड़ता है.”

इस जुलूस का ऐतिहासिक महत्व भी बहुत गहरा है. स्थानीय निवासी नीलांश श्रीवास्तव ने बताया कि यह परंपरा आजादी से भी पुरानी है. उन्होंने कहा, “मैं 24 साल का हूं और बचपन से इस अद्भुत दृश्य को देखता आ रहा हूं. यह परंपरा 1920 से चली आ रही है. अंग्रेजों के समय में इसे रोकने की कोशिश भी की गई थी, लेकिन इसे फिर से शुरू करवाया गया.”

नीलांश ने आगे कहा, “इस परंपरा का चमत्कार आप इसी बात से समझ सकते हैं कि जुलूस वाली रात पूरा दारागंज जागता है. हर कोई पूजा और आरती के लिए उत्सुक रहता है. ऐसा लगता है जैसे सड़कों पर एक नई रोशनी और नई ऊर्जा उतर आई हो.”

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पीआईएम/एबीएम

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