जम्मू : एनआईए कोर्ट ने शब्बीर शाह की जमानत अर्जी खारिज की

जम्मू, 7 अक्टूबर . एनआईए की एक स्पेशल कोर्ट ने 1996 में श्रीनगर में हुई एक कथित हिंसक अंतिम संस्कार यात्रा से जुड़े मामले में शब्बीर अहमद शाह की जमानत अर्जी खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने भीड़ में उनकी खास और अहम भूमिका बताई है और इस स्टेज पर उनकी रिहाई से ट्रायल पर असर पड़ सकता है.

जम्मू में एनआईए मामलों के स्पेशल जज प्रेम सागर ने शेरगढ़ी Police स्टेशन दर्ज First Information Report के आधार पर जमानत अर्जी खारिज कर दी. यह मामला 17 जुलाई 1996 को आतंकी हिलाल अहमद बेग की मौत के बाद निकाली गई अंतिम संस्कार यात्रा से जुड़ा है.

अभियोजन पक्ष के अनुसार, श्रीनगर में यह यात्रा जैना कदल से ईदगाह की ओर गई और कथित तौर पर नवा क्रॉसिंग के पास हिंसक हो गई थी. एनआईए का आरोप है कि शब्बीर शाह यात्रा का नेतृत्व करने वाले मुख्य लोगों में शामिल थे, नारे लगा रहे थे और भाषण दे रहे थे जबकि घटना के दौरान अज्ञात हथियारबंद लोगों द्वारा पत्थरबाजी और गोलीबारी की भी सूचना मिली थी. इस मामले में आरपीसी की धारा 147, 148, 336, 341, 307, 332 और 427 के अलावा यूएपीए की धारा 13 और आर्म्स एक्ट की धारा 7 और 27 लगाई गई हैं.

शब्बीर शाह की ओर से सीनियर एडवोकेट मोहम्मद असलम गोनी पेश हुए. उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला लगभग तीन दशक पुरानी घटना से जुड़ा है, आरोपी जांच एजेंसियों के लिए उपलब्ध रहे हैं और सिर्फ आरोपों के आधार पर लंबे समय तक जेल में रखने को सही नहीं ठहराया जा सकता. बचाव पक्ष ने शाह की उम्र, मेडिकल स्थिति, लंबे समय तक हिरासत और दूसरे आरोपियों को जमानत मिलने का भी हवाला दिया और कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे उनके द्वारा हिंसा का कोई सीधा काम साबित हो सके.

अर्जी का विरोध करते हुए एनआईए की ओर से पेश पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अश्वनी वर्मा और चंदन कुमार सिंह ने कहा कि शब्बीर शाह ने कथित तौर पर यात्रा में मुख्य भूमिका निभाई थी और समर्थकों के बीच उनका प्रभाव था. अभियोजन पक्ष ने इस बात पर भी जोर दिया कि सुरक्षित गवाहों से पूछताछ हो चुकी है और आगे की जांच जारी है.

अदालत ने गौर किया कि यूएपीए की धारा 13 के तहत शब्बीर शाह पर मामला दर्ज किया गया है, यह अपने आप में धारा 43-डी(5) के तहत जमानत की सख्त शर्तों को लागू नहीं करती है. यह धारा यूएपीए के अध्याय IV और VI के तहत आने वाले अपराधों पर लागू होती है. इसलिए, जमानत से जुड़े सामान्य सिद्धांतों के आधार पर ही इस अर्जी पर विचार किया गया.

अदालत ने कहा कि इस बात की वाजिब आशंका है कि शब्बीर शाह की रिहाई से मुकदमे की निष्पक्ष कार्यवाही पर असर पड़ सकता है और सुरक्षित गवाहों के भरोसे और सुरक्षा पर बुरा असर पड़ सकता है. इसी आधार पर अदालत ने शाह की जमानत अर्जी खारिज कर दी.

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डीकेएम/पीएम

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