चंद्रबाबू नायडू से जुड़े मामलों की सीबीआई जांच की मांग पर सुनवाई टली, 10 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

अमरावती, 5 नवंबर . आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने Chief Minister एन. चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ दर्ज मामलों की जांच सीआईडी से लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई 10 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी है.
मुख्य न्यायाधीश लीजा गिल की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता कोट्टी बालगंगाधर तिलक द्वारा दायर पीआईएल पर अगली सुनवाई की तारीख 10 नवंबर निर्धारित की.
यह जनहित याचिका 2024 में राज्य में Government बदलने के बाद दायर की गई थी. याचिकाकर्ता का तर्क है कि सत्ता परिवर्तन से मामलों की जांच प्रभावित हो सकती है और उन्हें बंद किया जा सकता है. याचिका में उन कई मामलों को बंद करने को भी चुनौती दी गई है, जिन्हें ‘तथ्यों की गलती’ मानते हुए निपटा दिया गया, जबकि पीआईएल अभी लंबित थी.
ये मामले अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों की आवंटित भूमि के हस्तांतरण, ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क टेंडर में कथित अनियमितताओं, कौशल विकास केंद्रों की स्थापना, इनर रिंग रोड के लिए भूमि अधिग्रहण, आबकारी नीति से जुड़े फैसलों और मुफ्त रेत नीति के निर्माण एवं क्रियान्वयन से संबंधित हैं.
याचिकाकर्ता ने एक अंतरिम याचिका भी दायर की है, जिसमें विजयवाड़ा एसीबी अदालत को निर्देश देने की मांग की गई है कि जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण संबंधित व्यक्तियों को वापस न किए जाएं.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत ने अदालत में कहा कि इन मामलों के शिकायतकर्ता Governmentी अधिकारी हैं और चंद्रबाबू नायडू के सत्ता में आने के बाद उन्होंने क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती नहीं दी है.
उन्होंने दलील दी कि ऐसे में मामलों की स्वतंत्र जांच और निष्पक्ष समीक्षा सुनिश्चित करने के लिए अदालत का हस्तक्षेप जरूरी है.
मामले में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित मामलों में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर स्वीकार भी की जा चुकी हैं. हालांकि, रिपोर्ट की प्रतियां हासिल करने और क्लोजर आदेशों को चुनौती देने से जुड़ी कुछ कार्यवाहियां अभी भी लंबित हैं.
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि आवंटित भूमि से जुड़े एक मामले में शिकायतकर्ता ने विरोध याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि सीआईडी-एसआईटी अधिकारियों ने क्लोजर रिपोर्ट के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र देने का दबाव बनाया था.
वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत ने कहा कि हाई कोर्ट एक संवैधानिक अदालत होने के नाते जरूरत पड़ने पर जांच का आदेश दे सकती है या निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए मामला सीबीआई को सौंप सकती है.
उनका कहना था कि केवल क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने से अदालत इस बात पर विचार करने से नहीं रुक सकती कि क्या स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है.
पिछले महीने हुई सुनवाई के दौरान राज्य Government और सीआईडी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत से पीआईएल खारिज करने का अनुरोध किया था.
उन्होंने कहा था कि विशेष जांच दल (एसआईटी) ने चंद्रबाबू नायडू से जुड़े मामलों में विजयवाड़ा एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) अदालत में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी है, जिसमें आगे कार्रवाई के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने की बात कही गई है.
रोहतगी ने अदालत को बताया था कि एसीबी अदालत ने इन रिपोर्टों पर विचार करने के बाद मामलों को बंद करने का आदेश दिया है. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोगों ने इन क्लोजर आदेशों को हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी है.
इन तथ्यों का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया था कि पीआईएल में अब विचार करने के लिए कुछ शेष नहीं बचा है और इसे निष्प्रभावी मानते हुए खारिज कर दिया जाना चाहिए.
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एएमटी/डीकेपी


