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Friday, 23 October 2026
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गिरिजा देवी : बचपन की बिंदास लड़की से ‘ठुमरी क्वीन’ तक का सफर, गायन रहा जीवन का आधार

गिरिजा देवी : बचपन की बिंदास लड़की से ‘ठुमरी क्वीन’ तक का सफर, गायन रहा जीवन का आधार

New Delhi, 23 अक्टूबर . संगीत की चर्चा में बनारस का नाम न आए, यह हो नहीं सकता है, क्योंकि यह शास्त्रीय गायकों का केंद्र रहा है. अपनी जादुई आवाज से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पारखी श्रोताओं को पीढ़ियों तक मंत्रमुग्ध करने वालीं गिरिजा देवी की कहानी भी इसी शहर से शुरू होती है.

गिरिजा देवी का परिवार अपने गांंव से बनारस शहर में आकर बसा था. बनारस में ही 8 मई 1929 को गिरिजा देवी का जन्म हुआ था. सुरीली आवाज की मल्लिका गिरिजा देवी काफी हद तक ‘टॉम बॉय’ जैसी थीं. इसका जिक्र उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में किया था. उन्हें घुड़सवारी, तैरना और मारपीट करना पसंद था, लेकिन पढ़ाई-लिखाई में उनकी कभी कोई खास दिलचस्पी नहीं रही.

गिरिजा की उम्र जब महज 5 वर्ष थी, तब वे पंडित सरजू प्रसाद मिश्रा से गायन की शिक्षा शुरू कर चुकी थीं. सरजू प्रसाद मिश्रा के दुनिया से विदा लेने के बाद गिरिजा ने पंडित श्रीचंद मिश्रा से आगे की शिक्षा ली. धीरे-धीरे उन्हें ‘राग’ और ‘टप्पा’ सिखाए गए और इसमें तीन-चार बरस गुजर गए.

धीरे-धीरे संगीत जगत में उनकी मेहनत रंग लाने लगी थी. वे 1949 में इलाहाबाद रेडियो से जुड़ीं, तब उम्र करीब 20 वर्ष थी. गिरिजा देवी ने एक इंटरव्यू में कहा था, “उस जमाने में स्टेशन डायरेक्टर समेत अन्य सभी लोग बैठकर सुनते थे, तब मैंने वहां राग ‘देसी’ गाया था और एक ठुमरी गाई थी. मैं बहुत खुले दिल से गा रही थी. मन में यही विचार थे कि होगा (चयन) या नहीं होगा, उसकी चिंता नहीं. उन लोगों ने बहुत पसंद किया और मेरा चयन किया.”

इसके दो साल बाद, 1951 में बिहार के आरा में पहला कॉन्फ्रेंस किया था. इस कार्यक्रम में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर और कंठे महाराज जैसे दिग्गज कलाकार भी शामिल थे. इस बारे में उन्होंने बताया था, “गुरु पंडित श्रीचंद मिश्रा वहां शत्रुघ्न प्रसाद, जिन्हें हम चाचा जी बोलते थे, को लेकर आए थे और उन्हें गाना सुनवाया था. इस पर शत्रुघ्न प्रसाद ने बोला था कि ‘इस लड़की (गिरिजा देवी) को हम जरूर अपने साथ लेकर जाएंगे. वहीं मेरा पहला कार्यक्रम हुआ था.”

1952 में वह ‘सदारंग संगीत सम्मेलन’ में हिस्सा लेने के लिए पहली बार कोलकाता आईं, जो ढाई दशक बाद उनका घर बन गया. उनका यह सफर फिर थमा नहीं और शहर-शहर कार्यक्रमों के सिलसिले में भ्रमण चलता ही रहा.

जब उन्होंने ‘पुरबी अंग’ की ठुमरी शैली में गायन किया, तो उनका सर्वश्रेष्ठ रूप सामने आया. उन्होंने इस शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद की. कजरी, चैती और होली जैसी अर्ध-शास्त्रीय विधाओं में उनके गायन ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पारखियों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

गिरिजा देवी ने ‘ठुमरी’ को लोकप्रिय बनाने और उसे एक नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई. इसी वजह से उन्हें ‘ठुमरी क्वीन’ कहा जाने लगा. गिरिजा मानती थीं कि ठुमरी गाना बहुत कठिन है. इसको मिश्रित करके गाया जाता है, इसलिए इसमें सब कुछ होना चाहिए.

ठुमरी के अलावा वे ख्याल, टप्पा, दादरा, कजरी, चैती और होली जैसी शैलियों में भी माहिर थीं. बेबाक और निडर स्वभाव ने उन्हें संगीत में एक अनोखी पहचान दिलाई. उन्होंने कहा था, “डर जैसा कुछ नहीं लगता था और इसलिए ‘गा दिया सो गा दिया’. अपना गा बजाकर चली आती थी.”

किसी भी दौर में उनकी सीखने की इच्छा खत्म नहीं हुई. वे कार्यक्रम से घर लौटतीं और बड़े-बड़े गायकों के गानों को रातभर सुना करती थीं. वे दिग्गज लोकगायकों के गाने भी सुनती और उनकी बारीकियों को समझने की कोशिश करतीं. गायन ही उनके जीवन का आधार था.

गिरिजा देवी ने देश और विदेश में कई प्रस्तुतियां दीं और उन्हें खूब सम्मान मिला. पद्म श्री (1972), पद्म भूषण (1989) और पद्म विभूषण (2016) के अलावा उन्हें Madhya Pradesh Government की ओर से ‘तानसेन सम्मान’ और ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ (1977) से भी नवाजा गया. 24 अक्टूबर 2017 को 88 वर्षीय गिरिजा देवी का कोलकाता में निधन हुआ.

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डीसीएच/एएस

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