‘भोजन न मिलने पर सूखी रोटी पानी में भिगोकर खाते थे सुंदर सिंह भंडारी’, पुण्यतिथि पर अमित शाह ने सुनाई संघर्ष की कहानी

New Delhi, 22 जून . जनसंघ के संस्थापक सदस्य और प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक सुंदर सिंह भंडारी की पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है. इस अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनके संघर्ष के दिनों को याद किया और कहा कि आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनका संघर्ष व विपरीत परिस्थितियों में भी सिद्धांतों से समझौता न करने का उनका संकल्प हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है.

गृह मंत्री अमित शाह ने Monday को social media प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “जनसंघ के संस्थापक सदस्य, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक सुंदर सिंह भंडारी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि. जनसंघ के प्रमुख स्तंभ सुंदर सिंह भंडारी ने भाजपा के संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे संगठन के ऐसे शिल्पकार थे, जिन्होंने व्यक्ति, समाज और संगठन की प्रतिभाओं को निखारने और गढ़ने का कार्य किया. आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनका संघर्ष व विपरीत परिस्थितियों में भी सिद्धांतों से समझौता न करने का उनका संकल्प हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है.”

अमित शाह ने एक वीडियो भी शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा, “सुंदर सिंह भंडारी Gujarat के Governor थे. स्वाभाविक रूप से विद्यार्थी परिषद और युवा मोर्चा के कार्यकर्ता उनके पास आते-जाते रहते थे. उनमें से एक मैं भी था. भंडारी जी का Gujarat से भी रिश्ता है. एक दिन बैठे थे और मैंने ऐसे ही पूछ लिया कि आपके पैर को क्या हो गया है. उन्होंने बात को हंसकर टाल दिया था. तब मैंने उनसे फिर से पूछा था तो उन्होंने बोला था कि इस बात को कहीं नहीं बताना है.”

शाह ने आगे कहा, “आज वह शख्सियत इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनका वो वाक्य और जानकारी हम सबको प्रेरणा देती है. उन्होंने बताया था कि जब वे Rajasthan में संघ का कार्य कर रहे थे, तब काम की स्वीकृति बहुत कम थी. हर जगह पर खाना नहीं मिलना था. संघ कार्यालय पर जब आते थे, तब रोटियों को कपड़ों की तरह सुखाते थे. सूखी हुई रोटियों को कपड़े में लपेट कर उन्हें थैले में डालकर वह साइकिल पर संघ का कार्य करते थे और गांव-गांव घूमते थे.”

अमित शाह ने बताया कि उस समय साइकिल चलाने के कारण पैर की पिंडलियां चौड़ी हो गई थीं. जब भोजन नहीं मिलता था तो सूखी रोटी को पानी में भिगोकर उसे खाते थे और आगे संघ का कार्य करने के लिए निकलते थे. इस प्रकार के तपस्वी जीवन से उन्होंने संघ को आगे बढ़ाया. आज भी मैं उस वाक्य को याद करता हूं तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं.”

डीसीएच/

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