
New Delhi, 10 अप्रैल . अभी तो Pakistan ने अमेरिका-ईरान जंग के बीच शांतिदूत बनने वाली अफवाह पर ठीक से अपनी पीठ भी नहीं थपथपाई थी कि अचानक उसकी पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ दिखने लगी. अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर कराने का दावा करने वाला Pakistan अब इजरायल के खिलाफ की गई बयानबाजी की वजह से चिंता में है. दूसरी तरफ ईरान जिसका वह शुभचिंतक बनने की जुगत में है, वही Pakistan के इस बिचौलिये वाले व्यवहार को पचा नहीं पा रहा है. ईरान ने इस्लामाबाद में अमेरिका के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के लिए टेबल पर बैठने से साफ इनकार कर दिया.
India तो पहले से ही कहता रहा है कि अमेरिका और चीन दोनों ने अपने फायदे के लिए Pakistan के कंधे पर रखकर सीजफायर वाली बंदूक चलाई. अमेरिका को अब तक इस युद्ध में इतना बड़ा नुकसान हुआ, जिसकी कभी उसने कल्पना भी नहीं की थी. ऐसे में वह इस युद्ध से सम्मानजनक रूप से निकलना चाहता था और इसके लिए अमेरिका ने ढुलमुल Pakistan को बिचौलिया बनाया. वहीं, चीन के कर्ज तले दबे Pakistan को भी पता है कि उसे अपने गले में फंदा लगने से बचने के लिए चीन की छत्रछाया चाहिए. साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए भी उसकी मदद चाहिए. ऐसे में अपनी दयनीय हालत को बेहतर बनाने के लिए Pakistan अमेरिका और चीन के सामने जाकर घुटनों के बल बैठ गया.
अमेरिका भी चालाक निकला. उसने ईरान से वार्ता के लिए Pakistan के इस्लामाबाद को चुना, जबकि अमेरिका के कोई भी शीर्ष नेता या अधिकारी 2006 के बाद से कभी भी सुरक्षा कारणों की वजह से Pakistan नहीं गए हैं. मतलब साफ है कि अमेरिका जानता था कि अगर सीजफायर की शर्तों को वह मान नहीं पाएगा तो वह इस्लामाबाद में सुरक्षा का हवाला देकर अपने लोगों को वार्ता के लिए नहीं भेजेगा और इस वार्ता की असफलता की पूरी जिम्मेदारी Pakistan के ऊपर आएगी. अमेरिका इससे भी साफ-साफ बचकर निकल जाएगा. लेकिन, Pakistan ने कभी नहीं सोचा था कि इस्लामाबाद आने से ईरान भी इनकार कर देगा और वार्ता से पहले ही उसकी जमकर किरकिरी हो जाएगी.
India का विपक्ष भले कई मुद्दों पर Government के साथ नहीं हो लेकिन Pakistan द्वारा सीजफायर वाले ‘दलाल’ की भूमिका को लेकर तो जरूर Government के साथ खड़ा है. प्रियंका चतुर्वेदी और शशि थरूर जैसे वरिष्ठ भारतीय राजनेताओं ने तो Pakistan की ऐसी इज्जत उतारी की वह भी शर्मा गया होगा. प्रियंका चतुर्वेदी ने तो पूरी टाइमलाइन के साथ बता दिया कि कैसे Pakistan अमेरिका का पाला हुआ जानवर है. वहीं, शशि थरूर ने कहा कि कई संकेत ऐसे हैं जो दिखाते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में असली फैसले कहीं और से लिए जा रहे हैं, Pakistan तो यहां सिर्फ एक मुखौटा है. उन्होंने शहबाज शरीफ के एक social media पोस्ट में इस्तेमाल की गई भाषा का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि इसे देख लीजिए ये अमेरिकी President डोनाल्ड ट्रंप के बयान से मेल खाती थी, जिससे यह संदेह और गहरा होता है.
शशि थरूर ने उसी बात की तरफ इशारा किया जो इस लेख में पहले लिखा गया है कि Pakistan ऐसी भूमिका निभा सकता है, जिसमें अमेरिका और ईरान तनाव कम हो और दोनों युद्धग्रस्त देशों को ऐसा भी न लगे कि वे एक-दूसरे के सामने झुक रहे हैं.
दूसरी तरफ Pakistan के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इजरायल और यहूदियों को लेकर कुछ ऐसा कह दिया कि इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू भड़क उठे और Pakistan को सीधी चेतावनी दे दी.
दरअसल, यह अब Pakistan के लिए चिंता का विषय बन गया है. Pakistan को पता है कि इजरायल अमेरिका नहीं है, वह अपनी मातृभूमि और अपने लोगों के खिलाफ अपमान किसी भी हालत में बर्दाश्त करने के मूड में नहीं होता है. हालांकि इजरायल से मिली तीखी प्रतिक्रिया के बाद ख्वाजा आसिफ अपनी पोस्ट डिलीट कर मैदान छोड़कर भाग गए.
इजरायल के खिलाफ आग उगलते हुए Pakistanी विदेश मंत्री ने कहा, “मैं उम्मीद और प्रार्थना करता हूं कि जिन लोगों ने फिलिस्तीनी धरती पर इस कैंसर जैसे राज्य का निर्माण किया है, वे यूरोपीय यहूदियों से छुटकारा पाएं और उन्हें नरक में जलाएं.” ख्वाजा आसिफ के इस घटिया बयान पर इजरायल के Prime Minister बेंजामिन नेतन्याहू ने Pakistan को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि इजरायल के विनाश की बात को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. पीएम नेतन्याहू ने social media प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “Pakistan के रक्षा मंत्री का इजरायल को खत्म करने का आह्वान बहुत बुरा है. यह ऐसा बयान नहीं है जिसे किसी भी Government से बर्दाश्त किया जा सके, खासकर उस Government से जो शांति के लिए न्यूट्रल आर्बिटर होने का दावा करती है.”
अभी तक तो Pakistan को अपनी सीमा पर संकट का सामना करना पड़ रहा था. लेकिन, पाक को पता है कि इजरायल से दुश्मनी उसे कितनी महंगी पड़ सकती है. Pakistan के पश्चिम में ईरान है जो खुद युद्ध से जूझ रहा है. पूर्व की दिशा में Pakistan की सबसे लंबी और संवेदनशील सीमा India के साथ है. जिसके साथ आजादी के बाद से ही उसने संबंध सामान्य रहने देने में अडंगा डाला है. उत्तर-पश्चिम में Pakistan की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है, जहां तालिबान Pakistan के खिलाफ हथियार लेकर अड़ा हुआ है. गिलगित का हिस्सा जिस पर अवैध रूप से Pakistan ने कब्जा कर रखा है, चीन सीमा के नजदीक है और वह यहीं से Pakistan में घुस रहा है. वहीं अरब सागर के पार ओमान के साथ इसकी समुद्री निकटता बहुत अधिक है.
अब Pakistan की मध्यस्थता वाले बिंदु पर आते हैं. ईरान और इजरायल से इस मध्यस्थता के लिए उसे फटकार मिली है. इजरायल तो इसे ‘नाकाबिल और अविश्वसनीय’ मध्यस्थ बता चुका है. वहीं ईरान भी इसे समय-समय पर फटकार लगाता रहा है. ईरान तो Pakistan को आतंकवादी ठिकानों का पनाहगार मानता है. ऐसे में सवाल यह है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को ही क्यों इस सीजफायर के लिए मोहरा बनाया? इसका जवाब है अमेरिका ने पाकिस्तान को भारी कर्ज दे रखा है, साथ ही आईएमएफ और विश्व बैंक की ओर से लोन देने के फैसले को भी सपोर्ट करता रहा है. Pakistan पर कर्ज सिर्फ पश्चिमी देशों और संस्थानों का नहीं है, बल्कि चीन भी उसका बड़ा कर्जदाता रहा है. चीन-Pakistan इकोनॉमिक कॉरिडोर परियोजनाओं के तहत चीन ने बड़े स्तर पर Pakistan में निवेश और लोन दिया है. ऐसे में जब जरूरत होती है Pakistan पर वैश्विक शक्तियों का दबाव बढ़ता है और उसे चीन और अमेरिका जैसे देश अपने लिए मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.
अब इस्लामाबाद में होने वाले ईरान-अमेरिका बातचीत की टेबल पर नजर डालें तो पता चल जाएगा कि इसमें Pakistan की औकात किस तरह की नजर आई है. दरअसल, ईरान की मीडिया की तरफ से साफ कहा जा रहा है कि उनके विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागर कालीबाफ दोनों ही तेहरान में मौजूद हैं और अपने काम में लगे हुए हैं. ईरान साफ कह रहा है कि जब तक लेबनान पर हमला नहीं रूकेगा, कोई बातचीत नहीं होगी.
ईरान और अमेरिका दोनों ही सीजफायर के बाद से अपनी-अपनी जीत का दावा कर चुके हैं तो फिर हार किसकी हुई है. दरअसल, इसमें हार Pakistan की है. अगर वार्ता असफल हुई और सीजफायर टूटा तो Pakistan के लिए ईरान अमेरिका से बड़ा दुश्मन बन जाएगा और अगर वार्ता सफल रही तो इजरायल को ललकारना Pakistan को भारी पड़ेगा.
Pakistan ने इस मध्यस्थता में अपनी पूरी Political पूंजी लगा दी है. अगर बातचीत विफल होती है तो Pakistanियों के लिए यह खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसे हालात हो जाएंगे.
Pakistan को यह भी पता है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस समझौते की स्थिति नहीं बनती है तो उसके पास इतनी ताकत नहीं हैं कि वह अमेरिका और ईरान को इस समझौते को मानने के लिए मजबूर कर सके.
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जीकेटी/