वाजिद खान की अनोखी दुनिया, जहां न ब्रश, न पेंट, पोर्ट्रेट पर हथौड़े और कीलों से रची जाती है एक नई कहानी

New Delhi, 9 मार्च . आज कहानी ऐसी शख्सियत की है, जो प्रख्यात मूर्तिकार, आविष्कारक और पेटेंट धारक होने के बावजूद आश्चर्यजनक रूप से भौतिक दुनिया से बेहद अलग-थलग हैं. चित्रकारी के लिए उनके पास पेंट, ब्रश और पेंसिल नहीं, बल्कि हथौड़े और कीलें मिलेंगी, जिनसे उन्होंने साबित करके दिखाया कि आर्ट को सिर्फ रंगों और ब्रश-पेंट से नहीं, बल्कि किसी भी वस्तु से बनाया जा सकता है.

Madhya Pradesh के मंदसौर जिले के सोनगिरी गांव में 10 मार्च 1981 को जन्मे वाजिद खान ने अपनी कला को विभिन्न माध्यमों से प्रस्तुत किया, जिनमें आयरन नेल आर्ट, ऑटोमोबाइल आर्ट और स्कल्पचर शामिल हैं. जब वाजिद ने Madhya Pradesh के मंदसौर में अपना घर छोड़ा तो उन्होंने पुराने कपड़े बेचकर, भूखे पेट सोकर और ठंड भरी रातें फुटपाथ पर बिताकर अपना गुजारा किया, लेकिन संघर्ष के उस दौर में उन्होंने अपने जीवन के कुछ सबसे महत्वपूर्ण सबक भी सीखे.

5वीं कक्षा के बाद ही घरवाले कला के शौक से परेशान हो गए. खेती करने वाले पिता तो बेहद नाराज रहते थे, जबकि वाजिद उस वक्त दुनिया की सबसे छोटी प्रेस बनाने में लगे थे. स्टील और लोहे से उन्होंने सबसे छोटी आयरन प्रेस बनाकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया.

14 साल की आयु तक आते-आते पानी में चलने वाला सबसे छोटा जहाज बना दिया. जमीन, पानी के बाद आसमान नापने की बारी थी और कलाकृति में बनाया हैलीकॉप्टर. जब इन कलाकृतियों पर तारीफें मिलीं तो वाजिद के सपनों को भी पंख लगने लगे. इन आविष्कारों को जिसने देखा वह हैरान था, लेकिन मार्गदर्शन न मिल पाने से इन आविष्कारों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे.

एक इंटरव्यू में वाजिद खान ने कहा, “मैं न स्केचिंग करता हूं और न मार्किंग करता हूं. मैं सीधे पोर्ट्रेट बनाता हूं. जब मैं कोई पोर्ट्रेट बनाता हूं तो मैं बोर्ड को फर्श पर रखता हूं और उस पर हथौड़े से ठोकता हूं, इसलिए मैं पोर्ट्रेट भी नहीं देख पाता. तीन साल तक मैं यह जानने का इंतजार करता था कि मैंने क्या बनाया है और वह कैसा दिखता है. अगर आप गलत जगह पर कील ठोक देंगे तो पूरा पोर्ट्रेट खराब हो जाएगा.”

वाजिद खान की कलाकारी सिर्फ कील तक सीमित नहीं है. उन्होंने मशहूर श्रीलंकाई आर्किटेक्ट जेफ्री बावा का अद्भुत चित्र बनाया और वो भी पत्थरों से.

वह एक परफेक्शनिस्ट हैं. मेथड एक्टर की तरह अपनी पोर्ट्रेट को फुल जस्टिस देने के लिए फुल कैरेक्टर में चले जाते हैं. वे कहते हैं, “मैं उस कैरेक्टर में जब जाता हूं तो जिंदगी जीता हूं. उस व्यक्तित्व को जीकर आता हूं. मुझे कठिन परिश्रम से ज्यादा उस शख्सियत को जीने में मजा आता है. मैं वैसे ही लिबास बनवाता हूं और उसी तरह का व्यवहार करता हूं, उसी तरह के शरीर के हाव-भाव होते हैं और वैसे ही घर पर काम करता हूं. मैंने अलग-अलग सेगमेंट में इतना काम सीख लिया कि दुनिया के किसी भी मटेरियल से आर्ट बना सकता हूं.”

उन्होंने अपने काम के लिए कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए हैं, जिनमें गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज करना शामिल है.

डीसीएच/डीकेपी

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