
New Delhi, 17 अप्रैल . वर्ष 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महान नायक तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग टोपे) को 18 अप्रैल, 1859 को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी दे दी थी. मात्र 45 वर्ष की आयु में मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले तात्या टोपे ने अपनी कुशल सैन्य रणनीति और अदम्य साहस से अंग्रेजी सेना को कई बार घुटने टेकने पर मजबूर किया था.
शिवपुरी के जंगलों में विश्वासघात के कारण बंदी बनाए गए इस महान क्रांतिकारी को ब्रिटिश सैन्य अदालत ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद ही मृत्युदंड सुनाया था.
तात्या टोपे का जन्म वर्ष 1814 में Maharashtra के नासिक जिले के येवला में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार से जुड़े अपने पिता पांडुरंग राव के साथ वे नाना साहब के निकट सहयोगी बने. 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान उन्होंने Kanpur के विद्रोह का नेतृत्व किया और बाद में ग्वालियर, झांसी व कालपी के युद्ध मैदानों में अपनी अद्वितीय छापामार रणनीति से ब्रिटिश सेना के दांत खट्टे कर दिए.
दुर्भाग्यवश, अपने ही सहयोगी मान सिंह के विश्वासघात के कारण 7 अप्रैल 1859 को ब्रिटिश सेना ने उन्हें सोते समय बंदी बना लिया. शिवपुरी में उनके विरुद्ध तेजी से मुकदमा चलाया गया, जहां तात्या टोपे ने निर्भीकता से कहा था, ‘मैं अंग्रेजों का गुलाम नहीं हूँ; मैंने जो कुछ भी किया, वह अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए किया.’ अंततः, 18 अप्रैल 1859 की सुबह India मां के इस वीर सपूत को फांसी दे दी गई.
तात्या टोपे का बलिदान 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की अंतिम लौ था. ब्रिटिश अखबारों ने भी उनके साहस की तारीफ की, जबकि भारतीय जनमानस में वे अमर हो गए. शिवपुरी में हर वर्ष उनकी याद में शहीद मेला लगता है.
तात्या टोपे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सबसे कुशल सैन्य नेताओं में से एक थे. औपचारिक सैन्य प्रशिक्षण के बिना भी वे गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) की कला में माहिर थे. पेशवाओं की परंपरा से प्रेरित उनकी रणनीति ने ब्रिटिश सेना को लगभग दो वर्ष तक चैन की सांस नहीं लेने दी थी.
तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का गठबंधन प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रेरणादायक और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सहयोग था. दोनों योद्धाओं के एक-दूसरे पर विश्वास, साहस और रणनीति ने ब्रिटिश सेना को मध्य India में सबसे बड़ी चुनौती दी थी.
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एसडी/एएस