
New Delhi, 28 अप्रैल . Supreme Court ने तमिलनाडु के दशकों पुराने एक जाली वसीयत और संपत्ति धोखाधड़ी मामले में आरोपी एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है.
कोर्ट ने कहा कि विवादित संपत्ति को किसी कीमती चीज के बदले में सिर्फ खरीद लेना, बिना किसी ठोस सबूत के जो दिखाए कि वह जालसाजी या साजिश में शामिल था, उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का आधार नहीं बन सकता.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की एक बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अपीलकर्ता एस. आनंद के खिलाफ 2004 की एक First Information Report के संबंध में चल रही कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था.
इस First Information Report में करूर जिले में एक वसीयत को जाली बनाने और पुश्तैनी संपत्ति की धोखाधड़ी से बिक्री करने का आरोप लगाया गया था.
सर्वोच्च न्यायालय ने अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि ‘सबूत का एक कण भी’ ऐसा नहीं था, जिससे संकेत मिले कि अपीलकर्ता ने 12 सितंबर, 1988 की विवादित वसीयत की कथित मनगढ़ंत रचना में कोई भूमिका निभाई थी या खरीद के समय उसे कथित जालसाजी की जानकारी थी.
न्यायमूर्ति नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी की कि अपीलकर्ता एक मूल्यवान प्रतिफल के बदले विचाराधीन संपत्ति का क्रेता है. उसे वर्तमान मामले के तथ्यों के आधार पर, ऐसा व्यक्ति नहीं माना जा सकता, जिसने कपटपूर्ण प्रलोभन दिया हो.
यह मामला शिकायतकर्ता के उन आरोपों से जुड़ा है कि उसके दिवंगत भाई ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रचते हुए, उनके पिता की वसीयत को जाली बनाया और उसका इस्तेमाल करके खरीदारों (जिनमें अपीलकर्ता भी शामिल है) के पक्ष में बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित किए. इस प्रकार, उसने वैध वारिसों को उनके संपत्ति अधिकारों से वंचित कर दिया.
Police ने जांच के बाद एक चार्जशीट दायर की, जिसमें संपत्ति के खरीदारों सहित कई आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 467, 468, 471, 420 और 120-बी के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया.
Supreme Court ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जांच करते हुए यह दर्ज किया कि अपीलकर्ता का न तो कथित जाली वसीयत बनाने से कोई संबंध था और न ही वह उन पिछली लेन-देन में कोई पक्षकार था, जो अभियोजन पक्ष के षड्यंत्र सिद्धांत का आधार बनी थीं.
शीर्ष अदालत ने संपत्ति विवादों में आपराधिक दायित्व को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए यह माना कि किसी ‘बोना फाइड’ (सद्भावपूर्ण) खरीदार के खिलाफ धोखाधड़ी के लिए आपराधिक मुकदमा आमतौर पर तब तक नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि धोखाधड़ी के इरादे या सक्रिय साजिश का कोई स्पष्ट सबूत न हो.
इसमें कहा गया कि न तो First Information Report और न ही विवादित आदेश से ऐसा कोई ठोस सबूत सामने आता है, जिससे आरोप की पुष्टि हो सके कि अपीलकर्ता ने कथित जाली वसीयत तैयार करने की साजिश रची थी.
Supreme Court ने आगे कहा कि जहां कोई व्यक्ति स्वामित्व का दावा करते हुए किसी संपत्ति को बेचता है, वहां धोखाधड़ीपूर्ण गलतबयानी के मामलों में आमतौर पर पीड़ित पक्ष खरीदार होता है, न कि कोई तीसरा पक्ष, सिवाय उन मामलों के जहां प्रत्यक्ष रूप से धोखा देना साबित हो जाए.
पीठ ने कहा कि असल में, भले ही यह आरोप कि वसीयत जाली थी सही साबित हो जाए, तब भी संपत्ति के खरीदार ही पीड़ित पक्ष होंगे, क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में विचाराधीन संपत्ति पर उनका मालिकाना हक विवादों में घिर जाएगा.
यह मानते हुए कि अपील करने वाले के खिलाफ क्रिमिनल कार्रवाई जारी रखना प्रोसेस का गलत इस्तेमाल होगा, Supreme Court ने कहा कि आगे केस चलाना ‘पूरी तरह से गलत’ होगा और यह ‘कोर्ट के प्रोसेस का बहुत ज्यादा गलत इस्तेमाल’ होगा.
इसके अनुसार, उसने पेंडिंग क्रिमिनल केस में अकेले अपील करने वाले के खिलाफ सभी कार्रवाई रद्द कर दी, और यह साफ किया कि बाकी आरोपियों के खिलाफ ट्रायल जारी रहेगा.
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एएसएच/एबीएम