
New Delhi, 29 अप्रैल . देश की शीर्ष अदालत ने Wednesday को हेट स्पीच (नफरत फैलाने वाले भाषणों) पर रोक लगाने के लिए कोई भी अतिरिक्त निर्देश जारी करने या नए दिशानिर्देश बनाने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानून ढांचा ऐसे अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त है.
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने Wednesday को उन सभी याचिकाओं को खारिज किया, जिनमें सांप्रदायिक हेट स्पीच के खिलाफ और अधिक न्यायिक दखल की मांग की गई थी. इन याचिकाओं में ‘कोरोना जिहाद’, ‘यूपीएसएस जिहाद’ और अलग-अलग धार्मिक सभाओं में दिए गए भड़काऊ भाषणों जैसी घटनाओं से जुड़े मामले शामिल थे.
जस्टिस विक्रमनाथ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि आपराधिक मामलों और उनके लिए सजा तय करना पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है. संवैधानिक अदालतें संसद या राज्य विधानसभाओं को नए कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं.
शीर्ष अदालत ने कहा, “हालांकि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं और मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए निर्देश जारी कर सकती हैं, लेकिन वे खुद कानून नहीं बना सकतीं और न ही कानून बनाने के लिए मजबूर कर सकती हैं.” कोर्ट ने आगे कहा कि अदालतें सुधार की जरूरत की ओर ध्यान दिला सकती हैं, जबकि कानून बनाने का फैसला संसद और राज्य विधानसभाओं के पास ही रहता है.
अदालत ने उस दलील को भी खारिज किया, जिसमें दावा किया गया कि मौजूदा कानूनों के तहत हेट स्पीच से ठीक से नहीं निपटा जा रहा है. कोर्ट ने कहा कि चिंता कानून में किसी कमी की नहीं, बल्कि उसके प्रभावी ढंग से लागू न होने की है.
इसी बीच, शीर्ष अदालत ने दोहराया कि किसी संज्ञेय अपराध (गंभीर अपराध) का पता चलने पर First Information Report दर्ज करना अनिवार्य है. अदालत ने कहा कि जिन मामलों में Police First Information Report दर्ज करने में नाकाम रहती है, वहां पीड़ित व्यक्ति Police अधीक्षक (एसपी) से संपर्क कर सकते हैं. इसके बाद वे मजिस्ट्रेट के सामने गुहार लगा सकते हैं या निजी शिकायत के जरिए आगे बढ़ सकते हैं.
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि केंद्र और राज्य Governmentें इस बात पर विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं कि क्या समाज में उभरती चुनौतियों के लिए और अधिक कानूनी दखल की जरूरत है, जिसमें 2017 की लॉ कमीशन की 267वीं रिपोर्ट में सुझाए गए संशोधन भी शामिल हैं.
यह फैसला उन याचिकाओं पर आया है जो 2020 से जुड़ी हैं. कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें आरोप लगाया गया था कि ब्रॉडकास्ट मीडिया, social media प्लेटफॉर्म और सार्वजनिक धार्मिक सभाओं के जरिए सांप्रदायिक बातें फैलाई जा रही हैं.
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