
New Delhi, 28 सितंबर . Supreme Court में एक नई याचिका दायर की गई है. इसमें India के चुनाव आयोग (ईसीआई) की शक्तियों के इस्तेमाल के तरीके को चुनौती दी गई है. साथ ही, यह सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल या प्रतिनिधित्व कर सकते हैं जो संवैधानिक रूप से कई सदस्यों वाले चुनाव आयोग को सौंपी गई हैं.
समाजसेवी राकेश कुमार सिंह (उर्फ राकेश सिंह) ने आर्टिकल 32 के तहत एक रिट याचिका दायर की है. इसमें चुनाव आयोग के कामकाज को चलाने वाले सामूहिक निर्णय लेने के ढांचे को लागू करने और ‘क्यू वारंट’ (अधिकार-पृच्छा) रिट जारी करने की मांग की गई है. यह रिट उस अधिकार के बारे में है जिसके तहत सीईसी ज्ञानेश कुमार ने कथित तौर पर ईसीआई के नाम पर काम किया है.
याचिका में कहा गया है कि संविधान का आर्टिकल 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार ‘आयोग’ को देता है, न कि किसी एक मुख्य चुनाव आयुक्त को. वहीं, ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की धारा 18 सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था करती है, जिसके तहत जिन मामलों में आम सहमति नहीं बनती, उन पर बहुमत से निर्णय लिया जाता है.
याचिका में कहा गया है, “यह याचिका किसी व्यक्ति विशेष या संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के भविष्य से नहीं, बल्कि खुद India निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की संवैधानिक पहचान से जुड़ी है.”
याचिकाकर्ता ने चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के उस समय के लिखित संचार और फाइल नोटिंग का हवाला दिया है. उन्होंने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच ईसीआई के नाम पर बिना उनकी मंजूरी के लिए गए फैसलों और कदमों पर कम से कम 14 आपत्तियां दर्ज कराई थीं.
याचिका में विस्तार से बताई गई आपत्तियां कई मामलों से जुड़ी हैं. इनमें चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना जारी किए गए कथित संचार और आदेश; बैठकों से पहले एजेंडा और बाद में मिनट्स (कार्यवृत्त) का न होना; बिना मंजूरी के विदेश यात्रा; फॉर्म 6 में बदलाव; मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुंच; और पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर करना, शामिल है.
याचिका में उन चिंताओं का भी जिक्र है जो कथित तौर पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने ‘मतदाता सूची डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण’ और चुनाव आयोग के आईटी विभाग के काम के बंटवारे में बदलाव को लेकर जताई थीं.
हालांकि, याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि इसमें Supreme Court से यह तय करने के लिए नहीं कहा जा रहा है कि क्या विवादित कदमों में से हर एक वास्तव में बिना कानूनी अधिकार के उठाया गया था. याचिका में कहा गया है, “याचिकाकर्ता इस अदालत से यह तय करने के लिए नहीं कह रहा है कि क्या इनमें से हर विवादित कदम असल में आयोग के कानूनी अधिकार के बिना उठाया गया था.”
इसमें कहा गया है कि यह मुद्दा मुख्य रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा, जिसमें ‘मीटिंग के मिनट्स, फाइल नोटिंग, मंजूरी की शीट और आदेश’ शामिल हैं, जिन्हें याचिका के अनुसार सार्वजनिक नहीं किया गया है.
याचिकाकर्ता ने ऐसे रिकॉर्ड पेश करने और यह घोषणा करने के लिए निर्देश मांगे हैं कि अनुच्छेद 324 के तहत ईसीआई को मिली शक्तियों का इस्तेमाल या उन्हें चुनाव आयोग के काम के तौर पर तब तक नहीं दिखाया जा सकता, जब तक कि वे चुनाव आयोग को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक और कानूनी ढांचे के अनुसार न हों.
याचिका में विवादित फैसलों से जुड़े मिनट्स, फाइल नोटिंग, मंजूरी की शीट और आदेशों जैसे जरूरी रिकॉर्ड पेश करने और उन्हें सुरक्षित रखने के अलावा सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने के लिए घोषणात्मक और अनिवार्य निर्देश भी मांगे गए हैं.
इस बीच, सामने आई आपत्तियों से जुड़े विवाद के जवाब में ईसीआई का कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा लिए गए फैसले, जिनमें स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) से जुड़े फैसले भी शामिल हैं, सर्वसम्मति से लिए गए थे और चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाए गए मुद्दे सामान्य विचार-विमर्श और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा थे.
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एससीएच/पीएम