
New Delhi, 24 सितंबर . Supreme Court ने Thursday को अपनी छह साल की सौतेली बेटी से बार-बार रेप करने और गला दबाकर उसकी हत्या करने के मामले में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा. हालांकि, कोर्ट ने उसकी मौत की सजा को बाकी प्राकृतिक जीवन तक उम्रकैद में बदल दिया.
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302, 376(2)(एफ), 376(2)(एन), 376एबी और 201 के साथ पॉक्सो एक्ट की धारा 5 और 6 के तहत अपराधों को संदेह से परे साबित किया है.
जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अपराध बेहद गंभीर था. इसमें बच्ची के अभिभावक द्वारा लंबे समय तक यौन शोषण किया गया और अपराध को छिपाने के लिए हत्या कर दी गई. इसके बावजूद दोषी से जुड़ी परिस्थितियों और उसके सुधार की संभावना को देखते हुए मौत की सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता.
Supreme Court ने कहा, “हमारा मानना है कि यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें मौत की सजा को बरकरार रखा जाना चाहिए.”
कोर्ट ने कहा कि दोषी को उसके बाकी प्राकृतिक जीवन के लिए बिना किसी सजा माफी के जेल में रखने की सजा उपलब्ध है और अपराध की गंभीरता को देखते हुए पर्याप्त है. इस मामले में सामान्य उम्रकैद, जिसमें 14 साल बाद सजा में छूट की संभावना होती है, पर्याप्त नहीं होगी.
कोर्ट ने कहा कि बच्ची का उसके अभिभावक द्वारा लगातार यौन शोषण और फिर उस अपराध को छिपाने के लिए उसकी हत्या करना इतना गंभीर अपराध है कि 14 साल बाद सजा में छूट की सामान्य संभावना वाली उम्रकैद न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी.
Supreme Court ने आईपीसी की धारा 302 और 376एबी के तहत दोषी को दी गई मौत की सजा को उसके बाकी प्राकृतिक जीवन तक बिना सजा माफी वाली उम्रकैद में बदल दिया. अन्य अपराधों के लिए दी गई सजा और जुर्माने को कोर्ट ने बरकरार रखा. साथ ही सभी मुख्य सजाओं को एक साथ चलाने का निर्देश दिया गया.
यह मामला वारिस नाम के व्यक्ति से जुड़ा है, जिस पर परिवार के घर के अंदर अपनी सौतेली बेटी का बार-बार यौन शोषण करने और बाद में गला दबाकर उसकी हत्या करने का आरोप था. पीड़िता की मां (दोषी की पत्नी) घर के अंदर हुई घटनाओं की एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी थी.
Supreme Court ने दर्ज किया कि पीड़िता की उम्र करीब छह साल थी और अपराध घर के अंदर हुआ था.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि बच्ची की मौत गला दबाने से दम घुटने के कारण हुई थी. इसमें ऐसी चोट भी पाई गई थी, जिसे डॉक्टर ने यौन हमले का संकेत माना था.
ट्रायल कोर्ट ने वारिस को दोषी ठहराते हुए आईपीसी की धारा 376एबी और 302 के तहत मौत की सजा सुनाई थी.
इसके बाद Madhya Pradesh हाईकोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा को बरकरार रखा था. हाईकोर्ट ने मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में माना था.
Supreme Court में सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट में पीड़िता की मां से की गई जिरह के तरीके को लेकर भी सवाल उठा था.
–
एएमटी/एबीएम