
New Delhi, 6 मार्च . संगीत जगत में ऐसे कई स्वरों के साधक हुए, जिनकी साधना गीत-संगीत के रूप में खूब चमकी और कभी पुरानी नहीं हुई. ऐसी ही संगीत की साधक हैं साधना सरगम. फिल्म जगत को एक से बढ़कर एक गाने देने वाली साधना के नाम से जुड़े मजेदार किस्से के बारे में कम ही लोग जानते हैं.
प्लेबैक सिंगर साधना सरगम का नाम भारतीय फिल्म संगीत में एक खास जगह रखता है. उनकी आवाज ने कई पीढ़ियों के दिल जीते हैं. एक पुराने इंटरव्यू में साधना सरगम ने अपने संगीत सफर, नाम के पीछे की कहानी, गुरुओं, प्रेरणा स्रोतों और शुरुआती चुनौतियों के बारे में खुलकर बात की. उन्होंने बताया कि उनका नाम “साधना सरगम” एक संयोग से नहीं, बल्कि माता-पिता की दूरदर्शिता और संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी के सुझाव से बना.
साधना सरगम ने बताया, “मेरा असली नाम साधना घाणेकर है. माता-पिता ने साधना नाम इसलिए रखा ताकि मुझे जीवन भर याद रहे कि संगीत की साधना कभी खत्म नहीं होनी चाहिए. जब मैं कल्याणजी-आनंदजी के पास शिमला प्रोग्राम के लिए गई, तो उन्होंने कहा कि साधना घाणेकर नाम अच्छा है, लेकिन म्यूजिकल नहीं. उन्होंने सुझाव दिया कि सरगम जोड़ लें. मैंने तुरंत हां कर दिया. तब से फिल्मों और हर जगह मेरा नाम साधना सरगम ही रहा.”
उन्होंने बताया, “मेरी जिंदगी में गुरुजनों का बहुत स्थान है. सबसे पहले मां नीला घाणेकर से संगीत सीखा, फिर पंडित जसराज से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली.” उन्होंने बताया, “पंडित जसराज से सीखना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है. 10-11 साल कल्याणजी-आनंदजी से तालीम ली थी.”
साधना सरगम ने बताया कि बचपन से ही संगीत उनके जीवन का हिस्सा था. चार साल की उम्र से गाना शुरू कर दिया था. मां क्लास चलाती थीं, इसलिए घर में शास्त्रीय संगीत का माहौल था. शुरुआत में उन्होंने सोचा था कि सिर्फ शास्त्रीय गायिका बनेंगी. सेंट्रल गवर्नमेंट स्कॉलरशिप मिली और पंडित जसराज के पास पढ़ाई का मौका मिला, लेकिन बाद में प्लेबैक सिंगिंग की ओर मुड़ गईं. उन्होंने बताया, “दोनों क्षेत्र मुश्किल हैं. तीन मिनट में परफेक्शन के साथ गाना उतना ही कठिन है जितना तीन घंटे का शास्त्रीय गायन.”
उनकी पहली रिकॉर्डिंग महज 5 साल की उम्र में वसंत देसाई के साथ हुई थी. मराठी कविता पर आधारित गीत था, जिसमें उन्होंने जिद करके अपनी गुड़िया साथ रखी थी. उन्होंने फिल्म ‘गुड्डी’ के गाने “हमको मन की शक्ति देना” के बारे में भी बात की क्योंकि यही गाना कल्याणजी-आनंदजी को सुनाकर उन्होंने पहला मौका पाया था.
प्रेरणा की बात करते हुए साधना सरगम ने लता मंगेशकर, आशा भोसले, किशोर कुमार, मुकेश और मोहम्मद रफी का नाम लिया. उन्होंने कहा, “इनकी आवाज सुनकर लगता है कि गाना कितनी ऊंचाई छू सकता है. लता ने कहा था कि सुर सही जगह पर लगना ही एक्सप्रेशन है. मैं उनके गानों को बार-बार सुनती हूं और उनसे सीखती हूं.”
मराठी परिवार से होने के बावजूद, हिंदी-उर्दू उच्चारण सही करने के लिए उन्होंने मौलवी सैय्यद अहमद सैय्यद से उर्दू पढ़ी-लिखी. इससे फिल्म ‘कलिंगा’ जैसे प्रोजेक्ट्स में दिलीप कुमार के सामने गाने का आत्मविश्वास मिला. साधना सरगम ने कहा कि उनके करियर में बड़ी परेशानियां नहीं आईं, क्योंकि सही मार्गदर्शन मिलता रहा, लेकिन वह खुद से ही असंतुष्ट रहती हैं कि और तेज प्रोग्रेस होनी चाहिए थी. उनका लक्ष्य है कि उनका गाना सुनकर लोग सुकून महसूस करें, तनाव भूल जाएं.
साधना कहती हैं, “मैं अच्छे सिंगर से ज्यादा अच्छा इंसान बनना चाहती हूं और संगीत के जरिए दूसरों की मदद करना चाहती हूं.” उन्होंने बताया कि वह आज भी रोज रियाज करती हैं और संगीत की साधना को कभी कम नहीं होने देतीं.
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एमटी/डीकेपी