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Tuesday, 3 November 2026
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परमवीर मनोज पांडे ने ग्रेनेड से उड़ाए दुश्मनों के बंकर, घायल होने के बाद भी हार नहीं मानी

परमवीर मनोज पांडे ने ग्रेनेड से उड़ाए दुश्मनों के बंकर, घायल होने के बाद भी हार नहीं मानी

New Delhi, 24 जून . ‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान 1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को जम्मू-कश्मीर के बटालिक में खालुबार रिज को दुश्मन से खाली कराने का काम सौंपा गया था. 3 जुलाई 1999 को जब उनकी कंपनी आगे बढ़ रही थी, तो दुश्मन ने उन पर जबरदस्त गोलीबारी शुरू कर दी. उन्होंने निडर होकर दुश्मन पर हमला किया, चार दुश्मन सैनिकों को मार गिराया और दो बंकर नष्ट कर दिए.

कंधे और पैर में चोट के बावजूद, वह पहले बंकर के पास पहुंचे और आमने-सामने की जबरदस्त लड़ाई में दो अन्य दुश्मनों को मार गिराया और बंकर पर कब्जा कर लिया. वह अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए एक के बाद एक बंकर खाली कराते रहे, जब तक कि उनके माथे पर गोली नहीं लग गई. उनके अदम्य साहस से प्रेरित होकर, उनके सैनिक दुश्मन पर हमला करते रहे और आखिरकार उस पोस्ट पर कब्जा कर लिया.

“अगर अपनी वीरता साबित करने से पहले ही मौत आ जाए, तो मैं कसम खाता हूं कि मैं मौत को ही मार डालूंगा.” यह शब्द थे, परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय के, जिनके भीतर देशभक्ति की ज्वाला बचपन से ही धधक रही थी.

25 जून 1975 को उत्तर प्रदेश के Lucknow में जन्मे मनोज कुमार पांडे अपने भाई-बहनों में सबसे बड़े थे. उनकी शुरुआती पढ़ाई Lucknow के सैनिक स्कूल में हुई. उनका हमेशा से सपना था कि वे भारतीय सेना की वर्दी पहनें. उन्होंने अपनी पर्सनल डायरी में लिखा था, ”कुछ लक्ष्य इतने शानदार होते हैं कि उनमें असफल होना भी गर्व की बात है.” इसका जिक्र India Government के वीरता पुरस्कारों की आधिकारिक वेबसाइट ‘गैलेंट्री अवार्ड्स’ पर मिलता है.

अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद सेना अधिकारी बनने का सपना पूरा करने के लिए वे खड़कवासला स्थित प्रतिष्ठित नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) में शामिल हुए. ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने अपनी ट्रेनिंग का आखिरी चरण पूरा करने के लिए देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) जॉइन किया और उन्हें 11 गोरखा राइफल्स (1/11 जीआर) की पहली बटालियन में कमीशन मिला. यह यूनिट अपनी बहादुरी के कारनामों के लिए जानी जाती है. कारगिल संघर्ष के दौरान, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को कैप्टन के पद पर प्रमोट किया गया.

जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, तब 1/11 गोरखा राइफल्स को सियाचिन ग्लेशियर में तैनात किया गया था. 1999 की गर्मियों में, Pakistanी सेना ने चुपके से भारतीय सेना की उन पोस्ट्स पर कब्जा कर लिया था, जिन्हें सर्दियों में खाली कर दिया गया था. 3 मई 1999 को घुसपैठ का पता चला. 25 मई को Government ने भारतीय वायुसेना के प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसके बाद भारतीय सेना ने घुसपैठियों को क्षेत्र से खदेड़ने के लिए ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया. दो महीने की लड़ाई के बाद 26 जुलाई 1999 को युद्ध खत्म हुआ.

‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान लड़ी गई अहम लड़ाइयों में से एक बटालिक सेक्टर में हुई थी. दुश्मन ने खालुबार रिजलाइन पर कब्जा कर लिया था और खोए हुए इलाके को वापस पाने के लिए दुश्मन को वहां से खदेड़ना जरूरी था. 2-3 जुलाई 1999 की रात को, 1/11 गोरखा राइफल्स की ‘बी’ कंपनी को खालुबार पर कब्जा करने का काम सौंपा गया. मनोज कुमार पांडे नंबर 5 प्लाटून के कमांडर थे. उनकी प्लाटून का मिशन दुश्मन की उन चौकियों को खत्म करना था, जो खालुबार रिज की ओर बढ़ते समय उनकी बटालियन की स्थिति को उजागर कर सकती थी और उन्हें खतरे में डाल सकती थी.

मनोज कुमार पांडे की अगुवाई में नंबर-5 प्लाटून ने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना शुरू किया. जब प्लाटून लक्ष्य के करीब पहुंची, तो आसपास की ऊंचाइयों और बंकरों से दुश्मन की भारी गोलीबारी होने लगी. मनोज पांडे को इन बंकरों को खाली कराने का काम सौंपा गया, ताकि बटालियन दुश्मन की नजर में न आए और सुरक्षित रहे.

दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच मनोज कुमार पांडे ने अपनी प्लाटून को तेजी से एक बेहतर स्थिति में पहुंचाया और अपनी प्लाटून के एक सेक्शन को दाईं ओर से दुश्मन की चौकियों को खाली कराने का आदेश दिया, जबकि उन्होंने खुद बाईं ओर से दुश्मन की चार चौकियों को खाली कराया.

उन्होंने निडर होकर दुश्मन की पहली चौकी पर हमला किया और दुश्मन के दो सैनिकों को मार गिराया. इसके बाद, उन्होंने दूसरी चौकी पर हमला किया और दुश्मन के दो और सैनिकों को मारकर उस पर कब्जा कर लिया. तीसरी चौकी को खाली कराते समय मनोज कुमार पांडे के कंधे और पैरों में दुश्मन की गोली लगी. अपने गंभीर घावों की परवाह किए बिना और बिना डरे, उन्होंने अपने सैनिकों को एकजुट किया और चौथी चौकी पर हमला करके उसे ग्रेनेड से नष्ट कर दिया.

इस हमले के दौरान, उनके माथे पर मशीन गन की घातक गोली लगी और बाद में वे अपनी चोटों के कारण शहीद हो गए. हालांकि, वे अपने सैनिकों को खालुबार पर कब्जा करने के लिए एक मजबूत आधार देने में सफल रहे. असाधारण वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए मनोज कुमार पांडे को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

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डीसीएच/एबीएम

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