
Mumbai , 14 अगस्त . शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने संसद के मॉनसून सत्र में कथित व्यवधान को लेकर विपक्ष और Lok Sabha में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के हंगामे के कारण Lok Sabha की कार्यवाही प्रभावी रूप से नहीं चल सकी. निरुपम ने दावा किया कि इससे न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था का नुकसान हुआ, बल्कि Governmentी खजाने पर भी आर्थिक बोझ पड़ा.
संजय निरुपम ने से बातचीत में कहा कि Lok Sabha की कार्यवाही सुचारू रूप से नहीं चल पाना लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है. मॉनसून सत्र पूरी तरह से धो डाला गया. Lok Sabha में एक भी दिन कार्यवाही नहीं हुई. इसके लिए विपक्ष और विशेष रूप से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने कहा कि विपक्ष का काम Government को घेरना, सवाल पूछना और जनता से जुड़े मुद्दों को सदन में उठाना है, लेकिन लगातार व्यवधान पैदा करना संसदीय लोकतंत्र के उद्देश्य के विपरीत है. उन्होंने इसे लोकतंत्र का मजाक और संसदीय जनतंत्र का मजाक बताया.
निरुपम ने कहा कि देश की आम जनता संसद की कार्यवाही को उम्मीद के साथ देखती है. जनता चाहती है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि उसके सवालों और समस्याओं को सदन में उठाएं और Government का ध्यान उन मुद्दों की ओर आकर्षित करें. संसद की कार्यवाही जब बाधित होती है तो Governmentी खजाने पर भी आर्थिक नुकसान पड़ता है. जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनकर संसद भेजती है ताकि वे उसके सवालों को मजबूती से सदन में रखें. ऐसे में सदन का लगातार बाधित होना जनता की उम्मीदों के साथ भी अन्याय है.
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर Prime Minister Narendra Modi के संदेश को लेकर संजय निरुपम ने 1947 के विभाजन की त्रासदी को याद किया. उन्होंने कहा कि आजादी से पहले India ने विभाजन की भयावह परिस्थितियों का सामना किया था. 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन उससे पहले India कई महीनों तक विभाजन की त्रासदी से गुजर चुका था. बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर और स्थान छोड़ने पड़े. विभाजन के दौरान बड़ी संख्या में हिंदू Pakistan के हिस्से से India आए, जबकि कई मुस्लिम India छोड़कर Pakistan चले गए. इस दौरान व्यापक स्तर पर सांप्रदायिक हिंसा हुई और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई. विभाजन के इतिहास में महिलाओं के खिलाफ हुई हिंसा की घटनाएं भी दर्ज हैं, जो उस दौर की पीड़ा को आज तक याद दिलाती हैं.
संजय निरुपम ने कहा कि देश को अपनी आजादी पूरे उत्साह और गर्व के साथ मनानी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही आजादी के बाद हुई विभाजन की त्रासदी को भी नहीं भूलना चाहिए. स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया, लेकिन आजादी के साथ ही विभाजन के दौरान भी बड़े पैमाने पर लोगों ने अपनी जान गंवाई. आने वाली पीढ़ियों को उस दौर के दर्द और पीड़ा के बारे में जानकारी होनी चाहिए, ताकि वे इतिहास से सीख ले सकें. विभाजन की त्रासदी को याद करना किसी समुदाय के खिलाफ नफरत पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास की भयावह घटनाओं से सीख लेने और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए जरूरी है.
जॉर्जिया मेलोनी को लेकर राहुल गांधी की ओर से की गई कथित टिप्पणी पर संजय निरुपम ने तीखी प्रतिक्रिया दी. राहुल गांधी की Political परिपक्वता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष के पद पर रहते हुए उन्हें यह समझना चाहिए कि किस मुद्दे पर क्या बोलना है और किस सीमा तक बोलना है. राहुल गांधी को Government की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन Prime Minister मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करना नेता प्रतिपक्ष के पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है. उन्हें अभी तक यह समझ नहीं आया है कि कहां क्या बोलना चाहिए, किसके बारे में क्या बोलना चाहिए और किस हद तक बोलना चाहिए.
शिवसेना प्रवक्ता ने कहा कि विपक्ष का काम Government की नीतियों की आलोचना करना और सवाल उठाना है. उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी कई बार Prime Minister Narendra Modi के खिलाफ व्यक्तिगत स्तर की टिप्पणियां करते हैं, जो नेता प्रतिपक्ष के पद की गरिमा को प्रभावित करती हैं. उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी पूरे विपक्ष का नेतृत्व करते हैं, इसलिए उनके बयानों का Political और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव पड़ता है. ऐसे में उन्हें अपने शब्दों और टिप्पणियों को लेकर अधिक सावधानी बरतनी चाहिए.
जॉर्जिया मेलोनी और Prime Minister Narendra Modi को लेकर social media पर बनाए जा रहे कथित मजाकिया मीम्स पर भी संजय निरुपम ने आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि इस तरह की सामग्री सिर्फ India के Prime Minister का अपमान नहीं करती, बल्कि इटली जैसे देश की महिला Prime Minister के सम्मान को भी प्रभावित करती है. social media पर मीम्स बनाना अलग बात है, लेकिन जब किसी संवैधानिक पद पर बैठे वरिष्ठ राजनेता की ओर से किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के बारे में टिप्पणी की जाती है, तो उसके प्रभाव को गंभीरता से देखा जाना चाहिए. राहुल गांधी को मर्यादा और संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए.
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पीएसके