
New Delhi, 24 मार्च . India का टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) को खत्म करने का सफर अब एक नए उत्साह और तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है. Government द्वारा ‘टीबी मुक्त India अभियान’ के तहत 100 दिनों का नया कैंपेन शुरू किया गया है, जो इस लड़ाई को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने इस मौके पर जन भागीदारी पर जोर दिया है. उनका कहना है कि जब पूरा समाज एक साथ आता है, तभी ऐसे बड़े स्वास्थ्य लक्ष्यों को हासिल करना संभव होता है.
दरअसल, इस पूरे अभियान की सोच Prime Minister Narendra Modi के विजन से प्रेरित है, जिसमें हर नागरिक की भागीदारी को जरूरी माना गया है. यही वजह है कि अब टीबी से लड़ाई सिर्फ Government या डॉक्टरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें गांवों की पंचायतों से लेकर युवाओं और आम लोगों तक, हर कोई शामिल हो रहा है.
स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने आधिकारिक social media अकाउंट ‘एक्स’ पर पोस्ट कर बताया, “India का टीबी (तपेदिक) को खत्म करने का सफर नई रफ्तार के साथ जारी है. देश ‘टीबी मुक्त India अभियान’ का एक और चरण ‘100 दिन का अभियान’ शुरू कर रहा है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने प्रगति को गति देने में ‘जन भागीदारी’ और ‘पूरे समाज के सहयोग’ की शक्ति पर अपने विचार व्यक्त किए हैं. Prime Minister Narendra Modi की सोच से प्रेरित, इस सामूहिक प्रयास ने सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी पहलों को मजबूती दी है और India को ‘टीबी मुक्त भारत’ बनाने के लक्ष्य के और भी करीब ला दिया है.”
बता दें कि पिछले कुछ सालों में India ने टीबी के खिलाफ लड़ाई में काफी अच्छे नतीजे भी हासिल किए हैं. साल 2015 के बाद से टीबी के मामलों में करीब 21 प्रतिशत की कमी आई है, जो वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी है. वहीं, टीबी से होने वाली मौतों में भी करीब 25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. ये आंकड़े दिखाते हैं कि जब विज्ञान, सिस्टम और समाज मिलकर काम करते हैं, तो बड़े बदलाव संभव होते हैं.
इस अभियान की एक खास बात यह है कि इसमें ‘टीबी विजेता’ यानी जो लोग इस बीमारी से ठीक हो चुके हैं, उन्हें भी शामिल किया गया है. ये लोग अब दूसरों को जागरूक कर रहे हैं और इलाज के दौरान उनका मनोबल बढ़ा रहे हैं. इसके अलावा, ‘माय भारत’ प्रोग्राम के तहत 2 लाख से ज्यादा युवा वॉलंटियर्स भी जुड़े हैं, जो मरीजों को मानसिक और सामाजिक समर्थन दे रहे हैं. इससे मरीजों को इलाज जारी रखने में मदद मिलती है और वे खुद को अकेला महसूस नहीं करते.
एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह आया है कि अब टीबी की पहचान के तरीके को भी बदला जा रहा है. पहले आमतौर पर उन लोगों की जांच होती थी, जिनमें लक्षण दिखते थे, लेकिन अब यह पाया गया है कि करीब आधे मरीजों में शुरुआती लक्षण दिखाई ही नहीं देते. ऐसे ‘साइलेंट केस’ ही बीमारी को ज्यादा फैलाते हैं, क्योंकि व्यक्ति को खुद नहीं पता होता कि वह संक्रमित है. इसलिए अब Government ऐसे लोगों की भी जांच पर जोर दे रही है, जिनमें लक्षण नहीं हैं लेकिन वे जोखिम वाले समूह में आते हैं.
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पीआईएम/एबीएम