मोहम्मद हुसामुद्दीन: जिम्नास्ट बनते-बनते मुक्केबाज बन गया निखत जरीन के कोच का बेटा

New Delhi, 11 फरवरी . India में पिछले कुछ वर्षों में जिन खेलों को बड़ी लोकप्रियता मिली है, उनमें मुक्केबाजी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. महिला और पुरुष दोनों वर्गों में भारतीय मुक्केबाजों ने वैश्विक स्तर पर बड़ी सफलता हासिल करते हुए देश का नाम रोशन किया है. इन मुक्केबाजों में एक नाम मोहम्मद हुसामुद्दीन का भी है.

मोहम्मद हुसामुद्दीन का जन्म 12 फरवरी 1994 को निजामाबाद, तेलंगाना में हुआ था. हुसामुद्दीन के घर में मुक्केबाजी का माहौल था. उनके पिता मोहम्मद शम्सुद्दीन एक बॉक्सर होने के साथ-साथ प्रसिद्ध कोच हैं. वह लंबे समय से निजामाबाद मुक्केबाजी का प्रशिक्षण केंद्र चलाते हैं. शम्सुद्दीन विश्व प्रसिद्ध महिला मुक्केबाज निखत जरीन के भी कोच रहे हैं.

हुसामुद्दीन के लिए मुक्केबाजी नया नहीं था. उनके 6 भाइयों में 4 मुक्केबाज रहे हैं. हालांकि उनके पिता पहले चाहते थे कि वे जिम्नास्ट बने, लेकिन घरेलू माहौल ने हुसामुद्दीन को मुक्केबाजी के लिए प्रेरित किया. इस क्षेत्र में आने के बाद उन्होंने अपने घर में सबसे बड़ी कामयाबी हासिल की और देश का नाम रोशन किया.

56 और 57 किलोग्राम भार वर्ग में प्रतिस्पर्धा करने वाले हुसामुद्दीन ने New Delhi में पहली इंडिया इंटरनेशनल ओपन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में गोल्ड कोस्ट में आयोजित 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीता. 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में, उन्होंने पुरुषों के 57 किलोग्राम फेदरवेट वर्ग में भी कांस्य पदक जीता.

सर्विसेज टीम के लिए बॉक्सिंग करते हुए, हुसामुद्दीन पुरुषों के बैंटमवेट (56 किग्रा) और फेदरवेट (57 किग्रा) कैटेगरी में हावी रहे हैं. पिछले पांच नेशनल्स में तीन गोल्ड मेडल और एक सिल्वर मेडल जीत चुके हैं.

हुसामुद्दीन को बॉक्सिंग के खेल में उनकी शानदार उपलब्धियों के लिए साल 2023 के अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है.

32 साल के इस मुक्केबाज को तकनीकी तौर पर मजबूत होने के साथ ही बहुत मेहनती, अनुशासित, और अपने लक्ष्य के प्रति केंद्रित माना जाता है.

पीएके

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