
Bhopal , 19 मार्च . Madhya Pradesh के Chief Minister मोहन यादव ने हिंदू नव संवत्सर की बधाई देते हुए कहा कि राज्य Government राजा विक्रमादित्य के आदर्शों को आत्मसात कर उसी राह पर चलने का प्रयास कर रही है.
सीएम मोहन यादव ने Thursday को राजधानी के रवींद्र भवन में आयोजित विक्रमोत्सव-2026 के अंतर्गत कोटि सूर्य उपासना कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आज गुड़ी पड़वा है. संपूर्ण सृष्टि में गुड़ जैसी मिठास फैल गई है. ऐसा इसलिए, क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति में आज से नव संवत्सर एवं नववर्ष का प्रारंभ हो गया है.
उन्होंने कहा कि हमारे यहां संवत् सृष्टि के साथ, प्रकृति के सानिध्य में और शासक के पुरुषार्थ से प्रारंभ होता है. सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को परास्त किया. तत्कालीन समाज के अराजक तत्वों और आतताइयों का दमन किया. उन्होंने अपनी संपूर्ण प्रजा को कर्जमुक्त बनाया. सच्चे अर्थों में सामाजिक सद्भाव की नींव रखी. वे लोकतंत्र के महानायक थे. उनके पुरुषार्थ से ही प्रारंभ किया गया विक्रम संवत् आज 2083 वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है.
Chief Minister ने कहा कि हमारी Government ने सम्राट विक्रमादित्य के ओजस्वी शासन उनके शौर्य, साहस, पराक्रम एवं न्याय के प्रतिमानों को आत्मसात करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का प्रयास किया. हम समाज के हर वर्ग के चहुंमुखी विकास के लिए प्रयासरत हैं. हमने वीर विक्रमादित्य शोधपीठ सहित वैदिक घड़ी की भी स्थापना की है.
इस दौरान सीएम मोहन यादव ने ब्रम्ह ध्वज की स्थापना कर कहा कि यह ध्वज हमें सदैव एकजुट रहकर देश-प्रदेश की सेवा करने की प्रेरणा देता है. सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी शासन व्यवस्था से राज व्यवस्था को लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलने का सूत्रपात किया. उनका नेतृत्व और राज-काज शैली ऐसी थी, जिसमें बाद के शासकों को जनकल्याणकारी शासन व्यवस्था के लिए प्रेरित किया. आज यदि दो हजार साल बाद भी सम्राट विक्रमादित्य को याद कर रहे हैं, तो इसके पीछे यह भाव परिलक्षित होता है कि India राष्ट्र की Government और राज्य Governmentें, वीर विक्रमादित्य की शासन व्यवस्था को अंगीकृत करना चाहती हैं.
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज स्वस्फूर्त और अनुशासित समाज है. हमने हमेशा जियो और जीने दो सहित सबको लेकर चलने की भावना से जीना सीखा है. सम्राट विक्रमादित्य ने लोकतंत्र को बढ़ावा दिया. इसी से लोकतंत्र के सूत्र हम भारतीयों के शरीर में रक्त की तरह प्रवाहित है और अब यह हमारे अस्तित्व की पहचान भी बन गया है.
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एसएनपी/डीकेपी