
Mumbai , 26 अप्रैल . Mumbai में एक बार फिर भाषा, पहचान और धार्मिक विचारों को लेकर बहस तेज हो गई है. शहर में मुंबा देवी मंदिर यात्रा के दौरान सेलिब्रिटी ज्योतिषी जय मदान और शिवसेना प्रवक्ता शाइना एनसी ने अलग-अलग मुद्दों पर अपने विचार रखे.
जय मदान ने अपनी बात की शुरुआत Mumbai की आस्था और मुंबा देवी मंदिर के महत्व से की. उन्होंने कहा, “Mumbai का नाम ही मुंबा देवी से जुड़ा हुआ है. यह शहर उनकी कृपा से ही आगे बढ़ता है. जिस तरह किसी भी शहर में वहां के स्थानीय देवी-देवता और परंपराओं का सम्मान किया जाता है, उसी तरह Mumbai में रहने वाले हर व्यक्ति के लिए मुंबादेवी का आशीर्वाद लेना जरूरी माना जाता है. जो लोग Mumbai में रहते हैं या यहां अपने करियर और जीवन की शुरुआत करना चाहते हैं, उन्हें मुंबादेवी के मंदिर जरूर जाना चाहिए.”
भाषा विवाद पर बात करते हुए जय मदान ने कहा, ”किसी भी राज्य में स्थानीय भाषा का महत्व होता है. आज के समय में एआई और ट्रांसलेटर टूल्स की मदद से किसी भी भाषा को समझना आसान हो गया है. हर भाषा का सम्मान करना चाहिए और भाषा को जोड़ने का माध्यम बनाना चाहिए, न कि विवाद का कारण.”
दूसरी ओर, शिवसेना प्रवक्ता शाइना एनसी ने भी अपनी बात रखी. उन्होंने मराठी भाषा के मुद्दे पर कहा, “मराठी भाषा हमारा गौरव और हमारी पहचान है. मोटर व्हीकल एक्ट में यह अनिवार्य है कि कोई भी सेवा प्रदाता, चाहे वह ऑटो-रिक्शा चालक हो या टैक्सी चालक, उन्हें मराठी बोलनी ही चाहिए, ताकि यात्रियों के लिए आसानी हो सके.”
उन्होंने कहा, “कहीं न कहीं लोगों ने दादागिरी की राजनीति की है. अपने अवसरवाद को लेकर उसे एक Political मुद्दा बनाया है. हालांकि, हमारे लिए यह अभिमान है कि राज्य में ज्यादा से ज्यादा लोग मराठी सीखें और बोलें.”
बाबा बागेश्वर के बयान से जुड़े सवाल पर शाइना एनसी ने कहा, ”India की जनसंख्या और सामाजिक संतुलन को लेकर विचार करना जरूरी है. देश की सुरक्षा और भविष्य के लिए समाज में जागरूकता आवश्यक है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य राष्ट्रवाद और सामाजिक योगदान को मजबूत करना है, जहां हर व्यक्ति अपने स्तर पर देश के निर्माण में योगदान देता है.”
बता दें कि मराठी भाषा विवाद हाल ही में लिए गए एक प्रशासनिक फैसले के बाद से ज्यादा बढ़ा है, जिसमें मीरा-भायंदर क्षेत्र में ऑटो चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने की बात सामने आई. इस फैसले के बाद Political बहस शुरू हो गई. कुछ नेताओं का कहना है कि यह स्थानीय भाषा और संस्कृति को मजबूत करने का कदम है, जबकि विरोध करने वालों का तर्क है कि इससे प्रवासी कामगारों पर दबाव बढ़ेगा और उनके रोजगार पर असर पड़ेगा.
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पीके/एबीएम