अमेरिकी दबावों का भारत ने दिया जवाब, खास रणनीति से हर क्षेत्र में बढ़ाया वैश्विक दायरा

New Delhi, 22 जून . अमेरिका के लिए India बेहद महत्वपूर्ण साझेदार है. बावजूद इसके अमेरिका ने President डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई ऐसे फैसले लिए और बयान दिया, जिससे India के साथ संबंध प्रभावित हुए. ट्रंप के तेवर और अमेरिका की बदलती कूटनीतिक चाल को देखते हुए India ने डायवर्सिफिकेशन मतलब विविधिता की रणनीति अपनाई.

एच-1बी वीजा, टैरिफ और वैश्विक संघर्षों के दौर में India ने किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय ऊर्जा, दवा, मेडिकल उपकरण, रक्षा, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों तक में विविधता पर फोकस किया, जो India की वैश्विक रणनीति में एक अहम मुद्दा बन गया. यही कारण है कि ईरान संकट, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की नीतिगत सख्ती के बावजूद India अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में बना हुआ है.

अमेरिका ने कई मोर्चों से India पर दबाव बनाने की कोशिश की. अमेरिकी Government ने एच-1बी वीजा के नियम सख्त करने का ऐलान कर दिया. इस फैसले ने भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों के बीच चिंता बढ़ा दी थी. इसके साथ ही ट्रंप Government ने प्रवासन कानूनों को लेकर भी सख्त रुख अपनाया.

दूसरी ओर, व्यापारिक मोर्चे पर टैरिफ और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच तनाव देखने को मिले. इस दौरान अमेरिकी President डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से कई तरह के बयान भी सुनने को मिले. हालांकि, India ने इन चुनौतियों का जवाब टकराव से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक योजना के जरिए दिया.

India ने डायवर्सिफिकेशन को इस पूरी स्थिति से निपटने के लिए हथियार बनाया. ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में India ने केवल एक या दो देशों पर निर्भर रहने के बजाय रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और अन्य आपूर्तिकर्ताओं से तेल खरीद के विकल्प बनाए रखे. वहीं वेनेजुएला के साथ भी बातचीत हो रही है. इससे किसी एक क्षेत्र में संकट पैदा होने पर ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा कम हुआ.

इसी तरह व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी India ने अपने साझेदारों का दायरा बढ़ाया. यूरोप, खाड़ी देशों, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश की. भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी), खाड़ी देशों के साथ निवेश सहयोग और विभिन्न मुक्त व्यापार समझौतों पर बातचीत इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.

रक्षा और रणनीतिक मामलों में भी India एक तरफ अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता रहा, तो दूसरी तरफ रूस, फ्रांस, इजरायल और अन्य साझेदार देशों के साथ भी अपने संबंधों को संतुलित बनाए रखा. इससे India को किसी एक शक्ति केंद्र पर अत्यधिक निर्भर होने से बचने में मदद मिली.

ईरान और अमेरिका हमलों के बीच होर्मुज से जहाजों की आवाजाही बाधित हुई, जिसकी वजह से तेल और गैस सप्लाई चेन पूरी तरह से बाधित हुआ. वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार मार्गों को लेकर जो चिंताएं सामने आईं, ऐसे समय में India ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और कूटनीतिक संवाद को मजबूत बनाए रखा. Government ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि वैश्विक संकट का असर घरेलू अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर न्यूनतम रहे.

इस बदलते भू-Political माहौल और संकट में India ने रणनीतिक स्वायत्तता, विविधीकरण और संतुलित कूटनीति को अपनी नीति का आधार बनाया. ऊर्जा के मामले में, पहले India पश्चिम एशिया पर अत्यधिक निर्भर था, जिसे अब उसने कई देशों में बांट दिया. ऊर्जा क्षेत्र में रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, ब्राजील और गुयाना India के सोर्स बने.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में चीन पर निर्भरता को कम करते हुए अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और इजरायल को अपना सोर्स बनाया. इसके साथ ही देश के भीतर “मेक इन इंडिया” के तहत मेडिकल डिवाइस पार्क बनाए गए.

India दुनिया की फार्मेसी कहलाता है, लेकिन एपीआई (सक्रिय औषधीय सामग्री) के लिए लंबे समय तक चीन पर निर्भर था. ऐसे में चीन पर निर्भरता कम कर यूरोपीय संघ के देशों से कुछ विशेष रसायनों की आपूर्ति, जापान के साथ फार्मा सहयोग, दक्षिण कोरिया के साथ केमिकल सप्लाई और घरेलू एपीआई उत्पादन बढ़ाने के लिए पीएलआई योजना को आगे बढ़ाया.

सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए India ने ताइवान, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों के साथ हाथ मिला लिया. Gujarat और असम में सेमीकंडक्टर परियोजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा हैं. इसके अलावा, India रक्षा खरीद में भी डायवर्सिफिकेशन लेकर आया और फ्रांस, अमेरिका, रूस, इजरायल और दक्षिण कोरिया के साथ साझेदारी और सहयोग को मजबूत किया.

उर्वरक और खाद्य सुरक्षा के अलग-अलग स्रोतों के तौर पर India ने रूस, सऊदी अरब, मोरक्को, ओमान, जॉर्डन और कनाडा के साथ सहयोग मजबूत किया. महत्वपूर्ण खनिज के क्षेत्र में भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ बेहद महत्वपूर्ण हैं. ऐसे में India ने ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, चिली, अफ्रीकी देश (कांगो आदि), ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के साथ सहयोग बढ़ाया.

व्यापार और निवेश के क्षेत्र में India ने समानांतर रूप से कई आर्थिक गलियारों और व्यापार समझौतों पर काम किया. यूएई (सीईपीए), ऑस्ट्रेलिया (ईसीटीए), यूरोपीय संघ (एफटीए), ब्रिटेन (एफटीए), सऊदी अरब और खाड़ी देश (निवेश साझेदारी) और आसियान देश (विनिर्माण और सप्लाई चेन) के साथ सहयोग बढ़ाया.

केके/एबीएम

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