
New Delhi, 11 जनवरी . अफ्रीका के जंजीबार द्वीपों पर 12 जनवरी 1964 को एक गंभीर Political बदलाव हुआ जब जंजीबार क्रांति के नाम से जाना जाने वाला विद्रोह साकार हुआ. इस विद्रोह में अफ्रीकी मूल के विद्रोही नेताओं ने द्वीप की सुल्तानी Government को सत्ता से हटा दिया, जो कि मुख्यतः अरब आबादी के नेतृत्व में थी.
यह क्रांति उस समय की Government के खिलाफ चल रही नाराजगी और सामाजिक असंतुलन का जवाब थी. ये द्वीप गुलामों की मंडी के लिए जाने जाते थे. अंग्रेजी हुकूमत से आजाद होने से पहले एक छोटे से युद्ध ने इसे इतिहास के पन्नों में पहले ही दर्ज करा दिया था. ये युद्ध 27 अगस्त 1896 को लड़ा गया और मात्र 38 मिनट तक चला था. तब ब्रिटिश नौसेना ने जांजीबार के महल पर हमला किया और महज 38 मिनट में ही एक संघर्ष विराम की घोषणा कर दी गई.
करीब 98 साल बाद फिर इतिहास ने करवट बदली. इस बार जांजीबार एक क्रांति के लिए जाना गया.
12 जनवरी को विद्रोह का नेतृत्व जॉन ओकेलो ने किया और उसके समर्थकों ने Police स्टेशन और अन्य Governmentी इमारतों पर कब्जा कर लिया, जिससे सुल्तान जमशिद बिन अब्दुल्लाह भागने को मजबूर हो गए. उसके बाद जंजीबार में नए नेतृत्व के रूप में शेख अबेइद आमानी करूमे को President घोषित किया गया, जिसने बाद में तंगानायिका के साथ मिलकर तंजानिया के Government की नींव रखी.
क्रांति के दौरान और उसके तुरंत बाद द्वीप पर सामाजिक और जातीय तनाव बहुत बढ़ गया. अरब और भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ हिंसा, संपत्ति की लूट तथा भारी जातीय संघर्ष देखने को मिला, और कई लोग मारे गए या निर्वासित हुए. इस घटना ने लगभग 200 वर्षों से चली आ रही अरब Political सत्ता को समाप्त कर दिया.
सुल्तान जमशिद बिन अब्दुल्लाह जिंदगी भर निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हुए. उन्होंने 30 दिसंबर 2024 को देश से दूर ओमान में अंतिम सांसें लीं.
जंजीबार क्रांति को इतिहास में याद किया जाता है क्योंकि इसने स्थानीय शासन को पूरी तरह बदल दिया और अफ्रीकी बहुसंख्यक आबादी को Political सत्ता दिलाई, तथा इसके कुछ महीनों बाद द्वीप के तंगानायिका के साथ विलय ने समकालीन तंज़ानिया राष्ट्र की नींव रखी.
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केआर/