यादों में नरेंद्र कोहली : राम और कृष्ण को नई नजर से देखने वाले साहित्यकार

New Delhi, 16 अप्रैल . क्या आपने कभी सोचा है कि रामायण के ‘राक्षस’ असल में कौन थे? नरेंद्र कोहली के महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘अभ्युदय’ में राक्षस कोई बड़े दांत और सींगों वाले डरावने जीव नहीं हैं. वे आज के दौर के खूंखार ‘आतंकवादी’ हैं, जो सभ्य समाज और बुद्धिजीवियों (ऋषि-मुनियों) को डराकर सत्ता हथियाना चाहते हैं.

इस उपन्यास में राम कोई चमत्कार नहीं करते. वे आसमान से तीर नहीं मंगवाते. वे एक कुशाग्र Political रणनीतिकार हैं. उनका 14 साल का वनवास कोई मजबूरी नहीं, बल्कि हाशिए पर पड़े आदिवासियों (वानरों और भालुओं) को एकजुट करके रावण के साम्राज्यवादी आतंक के खिलाफ एक Political आंदोलन खड़ा करने की अचूक रणनीति है.

नरेंद्र कोहली ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास श्रृंखला ‘महासमर’ (विशेषकर कुंती, द्रौपदी, सुभद्रा आदि खंडों) में महिलाओं के दृष्टिकोण को प्रमुखता से उकेरा है. उन्होंने कुंती और द्रौपदी को आमने-सामने खड़ा किया.

कुंती वह ‘आदर्श मां’ हैं, जो सिर्फ सहना और त्याग करना जानती हैं. लेकिन द्रौपदी एक स्वतंत्र और संप्रभु स्त्री है. वह चुपचाप अन्याय नहीं सहती, वह अपने अधिकारों के लिए लड़ती है और अपने पतियों के राजधर्म पर तीखे सवाल उठाती है. यहां तक कि उन्होंने ‘दानवीर कर्ण’ के अंधाधुंध महिमामंडन की भी धज्जियां उड़ा दीं और सवाल पूछा कि अंध-निष्ठा कभी ‘धर्म’ कैसे हो सकती है?

6 जनवरी 1940 को जन्मे नरेंद्र कोहली की सोच कितनी आधुनिक थी, इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण उनका उपन्यास ‘अभिज्ञान’ है. सदियों से हम सुनते आए हैं कि सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे और कृष्ण ने चमत्कार से उनकी झोपड़ी को महल बना दिया.

लेकिन नरेंद्र कोहली पूछते हैं, सुदामा गरीब क्यों थे? क्योंकि वह एक अत्यंत मेधावी बुद्धिजीवी और रिसर्चर थे, और जिस समाज में बुद्धिजीवियों के पास ‘सत्ता’ और ‘कलेक्शन’ नहीं होते, वहां उन्हें भूखा ही मरना पड़ता है. कृष्ण से मिलने के बाद सुदामा का महल बनना कोई चमत्कार नहीं था. यह सत्ता के ‘संरक्षण’ का समाजशास्त्र था. जब समाज के ठेकेदारों को पता चला कि यह फटेहाल आदमी देश के सबसे बड़े शासक (कृष्ण) का जिगरी दोस्त है, तो उन्होंने रातों-रात उसे वीआईपी बना दिया.

नरेंद्र कोहली सिर्फ महाकाव्यों के रचयिता नहीं थे. जब वे व्यंग्य लिखने पर आते थे, तो उनकी कलम एक ‘सर्जिकल ब्लेड’ बन जाती थी. ‘गणतंत्र का गणित’ और उनके तमाम नाटकों (जैसे ‘शंबूक की हत्या’) में उन्होंने जातिवाद, नौकरशाही की संवेदनहीनता और चुनाववादी राजनीति के पाखंड को बुरी तरह उधेड़ कर रख दिया.

दिल्ली विश्वविद्यालय में तीन दशक तक पढ़ाने वाले इस प्रोफेसर ने 1995 में पूर्णकालिक लेखन के लिए नौकरी छोड़ दी. वर्ष 2000-2001 तक आते-आते वे अपने सृजनात्मक शिखर पर थे. स्वामी विवेकानंद के जीवन पर उनका वृहद उपन्यास ‘तोड़ो कारा तोड़ो’ India के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सबसे बड़ा दस्तावेज बन चुका था.

India Government ने उनके इस अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें ‘पद्मश्री’ (2017) से नवाजा. इसके अलावा उन्हें व्यास सम्मान, शलाका सम्मान और साहित्य भूषण जैसे देश के लगभग सभी बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उनकी जयंती 6 जनवरी को साहित्य जगत में ‘साहित्यकार दिवस’ के रूप में मनाई जाती है.

17 अप्रैल 2021 को 81 वर्ष की आयु में इस कालजयी कलमकार ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

वीकेयू/एबीएम

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