
वॉशिंगटन, 21 जून, . अमेरिका के President डोनाल्ड ट्रंप के ईरान समझौते को लेकर Sunday को Political विवाद और तेज हो गया. पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसान राइस ने इस समझौते के ढांचे को ‘हैरान कर देने वाला और बेहद खराब आत्मसमर्पण’ बताया, जबकि ट्रंप प्रशासन का कहना है कि उसने ईरान को कमजोर स्थिति में बातचीत करने पर मजबूर किया है.
यह बहस दिखाती है कि ईरान को लेकर President की रणनीति पर वॉशिंगटन में गहरे मतभेद हैं. यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब पिछले कुछ महीनों में सैन्य टकराव, होर्मुज स्ट्रेट में बाधाएं और दोनों देशों के बीच फिर से कूटनीतिक बातचीत देखने को मिली है.
एबीसी के कार्यक्रम ‘दिस वीक’ में बोलते हुए सुसान राइस ने ओबामा प्रशासन के किसी वरिष्ठ पूर्व अधिकारी की ओर से अब तक की सबसे कड़ी आलोचनाओं में से एक की.
राइस ने कहा, “यह बहुत ही गंभीर और गलत कदम है.” उनका कहना था कि अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई व्यापक और अंतिम समझौता हासिल किए बिना ही उसे बड़ी रियायतें दे दी हैं. उन्होंने इस समझौते के ढांचे को ‘हैरान कर देने वाला, बेहद खराब आत्मसमर्पण’ बताया.
राइस का कहना था कि अंतिम समझौता होने से पहले ही ईरान को खुलकर तेल बेचने, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंच पाने और अपने जमे हुए धन को वापस हासिल करने की दिशा में बढ़ने की अनुमति मिल गई है.
उन्होंने कहा, “जैसा कि मंत्री ने खुद माना, समझौते पर हस्ताक्षर होते ही, यानी Thursday से, ईरान अब अपना सारा तेल और तेल उत्पाद बिना किसी रुकावट के वैश्विक बाजार में बेच सकता है.”
उन्होंने उन प्रावधानों पर भी चिंता जताई जिनके बारे में उनका कहना था कि भविष्य में प्रतिबंध हट सकते हैं और ईरान के आसपास अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कम हो सकती है.
राइस ने कहा, “इस समझौता ज्ञापन (एमओयू) की एक और हैरान करने वाली बात यह है कि हम ईरान के आसपास के क्षेत्रों से अमेरिकी सैन्य बलों को हटाने का वादा कर रहे हैं. इससे हमें बड़ा नुकसान होगा.”
ट्रंप प्रशासन ने इन आलोचनाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया.
ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि ईरान पहले की तुलना में कहीं ज्यादा कमजोर स्थिति में बातचीत की मेज पर आया है. इसके पीछे सैन्य दबाव और होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही का फिर से सामान्य होना प्रमुख कारण हैं.
राइस ने कहा, “हम पहले कभी ऐसी स्थिति में नहीं रहे. इस बार उनके पास वह ताकत नहीं है जो पहले बातचीत के दौरान होती थी.”
उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचा है और प्रशासन ने दबाव की रणनीति अपनाकर ईरानी नेतृत्व को बातचीत के लिए तैयार किया है.
यह विवाद इस बात को भी सामने लाता है कि अमेरिका को ईरान से कैसे निPatna चाहिए, इस पर दोनों पक्षों की सोच अलग है. राइस का मानना है कि शुरू से ही कूटनीतिक बातचीत का रास्ता अपनाया जाना चाहिए था.
उन्होंने कहा, “दशकों से यह साफ था कि इस समस्या का स्थायी समाधान केवल बातचीत और कूटनीति के जरिए ही संभव है.”
राइस ने यह भी चेतावनी दी कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अभी भी लगभग वैसा ही बना हुआ है.
उन्होंने कहा, “इस समझौते में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि परमाणु सामग्री को ईरान से बाहर ले जाया जाएगा.”
यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब उपPresident जेडी वेंस स्विट्जरलैंड में ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की तैयारी कर रहे हैं. इन वार्ताओं का उद्देश्य एक व्यापक समझौते की दिशा में बातचीत को आगे बढ़ाना है. इसका नतीजा मध्य पूर्व में अमेरिका की नीति और वैश्विक ऊर्जा बाजारों दोनों पर असर डाल सकता है.
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एवाई/डीकेपी